फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख॥
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नींवां करि देखु॥6॥
(अकलि लतीफु=बारीक समझ वाला, काले लेखु =मन्दे करम, गिरीवान=अंदर)
सूफी संत बाबा फ़रीद हुए हैं। फरीदा तू अक्लमंद है तो पाप कर्म मत कर और अपना सर झुका कर अपने भीतर देख। अर्थात् अपनी अच्छे बुरे कर्मों को खुद देख।
देखु फरीदा जि थीआ सकर होई विसु ॥
सांई बाझहु आपणे वेदण कहीऐ किसु ॥10॥
( जि थीया =जो कुछ हुआ है, सकर=शक्कर, मीठे पदारथ, विसु=ज़हर, दुखदायी, वेदण= दुख )
फिर कहते हैं देख फ़रीदा यह जो शकर है वही विष हुआ है अर्थात् जग में जो जो तू बहुत बेहतरीन समझ रहा था वही तेरे लिए विष के समान हो गया है।
सुन कर थोड़ा अजीब सा लग रहा है कि फ़रीद खुद ही फ़रीद से कह रहे हैं। इसके दो मतलब समझ में आते हैं। एक तो यह कि फ़रीद इतनी कड़वी बात सीख के रूप में किसी को कहते तो शायद उन्हे कोई सुनता ही नहीं शायद इसलिए वे ख़ुद से कह रहे हैं लेकिन वे उनके नहीं हमारे लिये ही कह रहे हैं। दूसरा यह कि उनके भीतर मौजूद साक्षी ही तो फ़रीद के लिए अर्थात् व्यष्टि के लिए कह रहा है। इस तरह सूफ़ीयाना अन्दाज़ कहने का कुछ हट कर ही होता है। ये पद लगभग ७५० वर्ष पूर्व लिखे गए हैं जो *गुरुग्रन्थ साहब* में दर्ज है।
अब देखें एक अर्वाचीन कवि का वही अन्दाज़---
*यही बस जिंदगी के चार पल का सार पाया है।*
*गुलाबो की कहानी में जहर का खार पाया है।।*
इसे बाबा फ़रीद की तराजू में तौल कर देखें तो कोई भावान्तर महसूस नहीं होगा। फर्क इतना सा है कि यहाँ हमें सीधा सीधा वही कहा जा रहा है। संसार की काम क्रोध लोभ मोह आदि की रसात्मकता अन्ततोगत्वा घातक ही है।
आगे कहा है----
*जला के घर स्वयं के रोशनी के छन्द लिखता हूँ।*
*उजाले बाँट कर भी राह में अँधियार पाया है।।*
रोशनी को बाँटने वाला साक्षी अपनी अस्मिता को मिटाने का उद्यत है इसलिए कहा गया है कि उसने जला के घर यानी ख़ुदी को मिटा कर औरों के लिए ज्ञान का प्रकाश बताया है।
अन्दाजे बयाँ अपना है पर कथन तो सारे सूफ़ियाना है। इन पदों को रचने वाले सक्ष हैं--डॉ जय वैरागी। छ्न्द बहुत सहज लग रहे हैं पर अध्यात्म के गहरे अर्थ लिये हुए हैं।
बाबा शेख फ़रीद का संक्षिप्त परिचय---
फ़रीद-उद्-दीन मसूद गंजशकर (११७३–१२६६) को आम लोग बाबा शेख फ़रीद या बाबा फ़रीद के नाम के साथ याद करते हैं। वह बारहवीं सदी के चिशती सिलसिले के सूफ़ी संत और प्रचारक थे। उन को पंजाबी बोली के आदि कवि के तौर पर जाना जाता है। उन की रचना श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी दर्ज है। उन की वाणी की ईश्वर मिलने की इच्छा, नम्रता, सादगी और मिठास, उन को सब लोगों में आदर योग्य और हरमन प्यारा बनाती है।
रामनारायण सोनी
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