Saturday, December 28, 2019

समाज का विकास और अवरोध

समाज के विकास में अवरोध

व्यक्ति से समाज और समाज से देश का निर्माण होता है लेकिन समाज शास्त्रियों के अनुसार व्यक्तियों के समूह को समाज मान लेना अधूरी अवधारणा है। किसी समाजशास्त्री ने समाज शब्द की उत्पत्ति और उसका व्यावहारिक स्वरूप इस तरह बताया है। जब एक गायक गायन करता है तो उसकी संगत करने के लिए दूसरे साज साथ साथ बजते हैं। इन साजों में आपस में बाँधने वाले स्वर मुख्य गायक अथवा साज के अनुरूप बजते हैं और जो समग्र स्वरूप निर्मित होता है वह समाज कहलाता है। इसी तरह समाज की निर्मिती में व्यक्तियों के उस समूह को लय बद्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। अर्थात् समाज का प्रत्येक अवयव लयबद्ध और चरणबद्ध होने पर ही वह संगठित हो सकता है। यह बात तय शुदा है कि लोग अपनी डफली अपना राग अलापने में लगे रहते हैं तो समाज संगठित नहीं हो सकता है। दूसरी बात यह है कि समाज के अंतिम छोर पर मौजूद आदमी का एक समग्र चिंता और चिंतन के बाहर नहीं होना चाहिए। वस्तुतः यह समाज के अग्रणी और सक्षम व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है कि उसके सारे नियम कायदे हर वर्ग और स्टेटस के लोगों के लिये युक्ति युक्त हो। व्यवस्थित और संगठित समाज एक मजबूत राष्ट्र का आधार होता है। राष्ट्र के सक्षम व्यक्तियों से विभिन्न करों/सहयोग के रूप में प्राप्त राजस्व का संचय होता है फिर इन परिलब्धियों से वंचित और जरूरतमंदों के लिए आयोजनों के माध्यम से व्यवस्थित होता है।
अब जरा विकास की प्रक्रिया पर गौर करें। विकास का मतलब अक्सर सड़क, पुल, पुलिया, तालाब, गृह निर्माण आदि से लिया जाता है जो एक अधूरी अवधारणा है वस्तुतः विकास के विभिन्न आयाम हैं। मोटे तौर पर इसे १. आर्थिक, २. सामाजिक, ३. सांस्कृतिक और ४. व्यावसायिक वर्ग में बांटा जाना चाहिए। समाज का आर्थिक ढांचा ऐसा होना चाहिए जिससे जीवन यापन और निर्वाह सुगम हो सके। सामाजिक स्तर पर व्यक्ति वस्तु और परस्पर आवश्यकता की आपूर्ति के लिए जुड़ा रहे। बहुधा समाज सांस्कृतिक मूल्यों की अनदेखी करता है और इसे विकास के परिप्रेक्ष्य से ही बाहर समझता है।
संस्कृति में भाषा व्यवहार परंपरा इतिहास और शास्त्रीय स्वरूप आदि का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि अपनी संस्कृति और परम्पराएँ विकास की बलि चढ़ जाए तो वह समाज जाति और राष्ट्र शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। विश्व में कई विकसित राष्ट्र इनकी अनदेखी करने पर नष्ट हो गए हैं। संस्कृति को लोग सभ्यता समझ बैठते हैं जबकि वह केवल रहन-सहन और व्यवस्थाओं का भाग है। संस्कृति तो व्यक्ति के आचरण व्यवहार विचार आदि तत्वों से परिपूर्ण होती है। समाज की निर्दिष्ट मान्यता के अनुसार यह तत्व समाज की प्रत्येक इकाई को बाँधकर रखती है। भारत वर्ष सांस्कृतिक विरासत का कुबेर है। हमारे देश में उत्सव प्रियता और उनका एकीकृत स्वरूप इतना विराट है कि हम मानसिक स्तर पर जुड़ा हुआ पाते हैं। यह श्रेष्ठ उदाहरण है कि प्रयाग में होने वाले महाकुंभ में कोई किसी को निमंत्रण नहीं भेजता फिर भी करोड़ों लोग उनमें शामिल होते हैं। समाज का जुड़ा रहना ऐसे में कितना सार्थक प्रतीत होता है और औद्योगिक संदर्भ में समाज शासन की नीतियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है तथा औद्योगिक और व्यावसायिक आधारभूत ढांचा आर्थिक स्तर को पुष्ट करता है। बिना उद्योग और व्यवसाय के राष्ट्र की प्रभुसत्ता और समाज की संपन्नता समाप्त हो जाती है। चाणक्य ने कहा था "किसी राष्ट्र की अथवा समाज की अस्मिता व्यापार व्यवसाय और विपणन पर निर्भर करती है।"
इन आधारभूत नियमों और ढांचागत तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में स्वर्णकार समाज की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि हम जाति अथवा समाज के स्तर पर बिखरे-बिखरे हैं। हमारी आर्थिक स्थिति बहुत विचारणीय हो गई ह यह विचार अपनी हीनता दर्शाने के लिए नहीं अपितु पुनर्स्थापना के लिए आलोच्य है। स्वर्णकार समाज का पारंपरिक व्यापार महाजनों एवं स्थापित व्यापारियों को हस्तान्तरित हो चुका है। पारंपरिक आभूषण निर्माण बाहर से आए कारीगरों के हाथ में चला गया है और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि हमने अन्य जातियों और समाज की तरह अपनी आजीविका के विकल्प नहीं तलाशे क्योंकि उन्हें हम मानसिक और वैचारिक रूप से निम्न स्तर का समझते हैं। हम अपनी सांस्कृतिक विरासत के दंभ में इधर के रहे ना उधर के नतीजा यह हुआ की आर्थिक रूप से लुटे भी और पिटे भी। मेरे व्यक्तिगत मत के अनुसार हमने अक्सर शिक्षा को महत्व कभी नहीं दिया। आज प्रत्येक व्यापार में टेक्नोलॉजी और एडवांस स्टडी अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है ऐसे में अशिक्षा अथवा अधूरी शिक्षा हमें नीचे गिराती चली गई। 
मेरा यह भी मानना है कि स्वर्णकार जेनेटिकली पक्का व्यापारी, परिपक्व कलाकार और सांस्कृतिक विरासत का धनी है परंतु उपरोक्त कमियों और अभाव के कारण वह समाज की दौड़ में पिछड़ गया है। हमारी आजीविका अब पारंपरिक रूप से मोनोपोली एकाधिकार वाली नहीं रह पाई है इसलिए हमें अपना आकलन हर बारीक से बारीक स्तर पर करना पड़ेगा। यह मात्र अवरोध है "डेड एंड" नहीं है।

 सदाशयता के साथ
 रामनारायण सोनी
२५ए, ब्रजेश्वरी मेन, इन्दौर
9340761477

 

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