Monday, December 30, 2019

जित देखूँ तित तू


*आज का स्मरण*

   *जित देखूँ तित तू*

मैंने पद्मनाभ को तो नहीं देखा पर धरती की गोद में लेटे उस तालाब में खिले पद्म को जरूर देखा है। जलते तपते सूरज को अपनी नग्न आँखों से नहीं पर उसकी किरणों को जीवन की बरसात करते देखा है। आकाश तो खाली जगह का नाम है कैसे देखता पर चौदहवीं के उस चाँद को आकाश में टँका जरूर देखा है जो चाँदनी का सौंदर्य धरती को ओढ़ाता है। इस धरती को मिट्टी सा तो देखा पर उसमें उसमें एक माँ को नहीं देखा जो अपनी कोख में जीवन सरसाती है। देखा तो मैनें उस सागर को भी नहीं पर उसके भेजे उन बादलों को जरूर देखा है। इस पवन को भूलूँ कैसे जो न होती तो मलय की खुशबू वहीं मर जाती। ये जो अगन मेरे पेट में लगी है, अगर नहीं होती तो खाया पिया पकाता कौन? प्राण को देख सका कौन पर हाड़ माँस के इन पिंजरों को चलते फिरते जरूर देखा है। धरती पर बहती नदियों की नसों नाड़ियों सी महसूस करता हूँ जो निर्जन से जीवन लेकर उतरती है। 
तू वैसे कभी न दिखा पर ऐसे पल पल दिखता है। मैं तेरे इस विशाल जगत के मंदिर की घण्टियाँ क्यों नहीं सुनता जो तेरा ही गुण गान करती है। मैं चूक गया कि बच्चों के रुदन में, किलकारियों में, मासूमियत में तुझे देख नही पाया कि वहाँ भी तू है। तू मुझसे अविरल प्रेम करता है। महसूस करना चाहिये मुझे कि "तू है तो मैं हूँ।"
 *जित देखूँ तित तू, बस तू ही तू।"*

रामनारायण सोनी
31.12.2019

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