नज़र क्या? नज़रिया क्या?
जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। शायद यह तुम जानते भी नहीं हो। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बों से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। तो फिर उनकी आँखों को क्यों अपनी रुलाई से भरते हो। अपने दुखों और पीड़ाओं को उनके मनों में क्यूँ ठूँसना चाहते हो। जरा सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। अरे, हाथों में पुष्प धरोगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी ही।
बड़ी अजीब बात है; कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और रस मलाई मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के बारी आई तो रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी रही सही संवेदनाएँँ भी मर चुकी है। रिवाजों और परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है। याद रखो कि हर समय अनुकूलता नहीं मिलेगी। इसलिए, "जमाने वालों किताबे गम में कोई तराना ढूँढो।" गुलमोहर को देखो पतझड़ में भी रंगों से लकदक है। सारे पात झड़ने पर भी टेसू के फूल पलाश को अकेला नहीं रहने देते। पतझड़ नही होगा तो बसन्त भी नही होगा।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजर खराब नहीं थी, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बाय-प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे मुख्य फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चिरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न दीपक ढूँढ पाओगे न ही दियासलाई । अंधेरे में न खुद को खुद दिखोगे और न किसी अौर को। दीपक जलाओ; उसकी रोशनी देख कर अंधेरे में से निकल कर कुछ और लोग भी आ कर तुम्हारे संग होंगे। तुम्हे साथ मिलेगा और उन्हें "तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
*"पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"*
थोड़ा रुको, सुनो! खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।
तो आओ! चलोगे न?
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