अनाज का दाना मात्र एक दाना है पर जब उगाने के लिए तैयार किया जाए तब वह बीज कहलाता है। दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होगा। और उससे भी अधिक होगा उत्सर्ग के लिये उद्यत होना। वृक्ष की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होगी एक धरती की कोख और दूसरी आकाश की विस्तीर्ण विधा। एक दिशा अन्धकार की एक प्रकाश की। एक से स्थायित्व मिलेगा दूसरे से विकास। उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण से लड़ना होगा तब जल प्रसेचन संभव होगा। उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि आम का वृक्ष तैयार हो जाने पर न बीज शेष होगा न उस बीज का नाम। अपने शरीर अौर नाम दोनों का त्याग अपने आप हो जायगा। अब वह दोनों से मुक्त है। जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही हो गया है। आम से चल कर आम होना कितना खास है। तुम अगर बीज हो तो रूपान्तरित हो कर आम हो सकते हो क्योंकि बीज होना आम का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है। तो समझ लो बीज हो आत्मा हो। मुक्त होना है तो उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग स्व का, संज्ञा का, नाम का। संकल्प मुक्त होने का, दिशाएँ पाने का, अपने मूल को प्राप्त होने का। .....
Tuesday, May 30, 2017
बीज का उत्सर्गत
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
लौट आओ चाँद मेरे!
लौट आओ चाँद मेरे! सुनो तुम भी ! मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी। चाँद शायद यह सोचता होगा ...
-
आत्मबोध व्यष्टि, समष्टि और सृष्टि, और आत्मा बबूल का बीज देखा है कभी? चपटी सी माला में एक बहुत सख्त छिलके वाला काली बटन सा बीज। एक आदमी जिद...
-
"*पाषाणी संवेदना, कितनी दूर;कितनी पास"* पत्थर को कभी बोलते सुनते देखा है? एक छोटे से छोटे प्रयास का मूल्यांकन करना है तो सबसे ...
-
क्या कानून केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखता है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम स...
No comments:
Post a Comment