Tuesday, May 30, 2017

बीज का उत्सर्गत

अनाज का दाना मात्र एक दाना है पर जब उगाने के लिए तैयार किया जाए तब वह बीज कहलाता है। दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होगा। और उससे भी अधिक होगा उत्सर्ग के लिये उद्यत होना। वृक्ष की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होगी एक धरती की कोख और दूसरी आकाश की विस्तीर्ण विधा। एक दिशा अन्धकार की एक प्रकाश की। एक से स्थायित्व मिलेगा दूसरे से विकास। उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण से लड़ना होगा तब जल प्रसेचन संभव होगा। उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि आम का वृक्ष तैयार हो जाने पर न बीज शेष होगा न उस बीज का नाम। अपने शरीर अौर नाम दोनों का त्याग अपने आप हो जायगा। अब वह दोनों से मुक्त है। जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही हो गया है। आम से चल कर आम होना कितना खास है। तुम अगर बीज हो तो रूपान्तरित हो कर आम हो सकते हो क्योंकि बीज होना आम का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है। तो समझ लो बीज हो आत्मा हो। मुक्त होना है तो उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग स्व का, संज्ञा का, नाम का। संकल्प मुक्त होने का, दिशाएँ पाने का, अपने मूल को प्राप्त होने का। .....







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