Sunday, June 17, 2018

आत्मबोध

आत्मबोध

व्यष्टि, समष्टि और सृष्टि, और आत्मा

बबूल का बीज देखा है कभी? चपटी सी माला में एक बहुत सख्त छिलके वाला काली बटन सा बीज। एक आदमी जिद पकड़ गया। एक पावरफुल माइक्रो स्कोप से उसमें पत्तियाँ, फूल अौर काँटे ढूँढ रहा था क्योंकि किसी ने कह दिया था कि बबूल का पेड़ इसी में से निकलेगा। यह बीज नहीं होगा तो बबूल का पेड़ भी नहीं होगा। अन्त में उसे लगा कि सच यह नहीं है, बस लोगों की मान्यता ही है।
हम भी इसी तरह हाड़ मांस के इस शरीर में किसी माइक्रोस्कोप से जीवन की चेतना को देखना चाहते हैं। विज्ञान अपने संसाधनों से झूम इन करते करते उस अंतिम छोर तक तलाश करना चाहता है जहाँ उसे जीवन का स्रोत दिखाई पड़ जाए। जब आगे कुछ समझ में नहीं आता है तो उस अंतिम छोर पर उपलब्ध कण को गॉड पार्टीकल कह कर संतोष कर लेता है। जैसे बबूल की फली, उसके बीज का छिलका, फिर दो दालें और किनारे पर उभरा भाग दिख जाता है पर उसके आगे जीवन के अवतरण के दर्शन नहीं हो सकते। चेतना कहाँ से आ कर कहाँ और कब चली जावेगी? न बीज जानता है न खुद पेड़। क्या चेतना वहाँ पहले से सो रही थी? क्या कोई विस्फोट हुआ कि उसमें से पेड़ फूट निकला? कैसे जड़ पदार्थ चेतना के द्वार पर जा खड़ा हुआ? अौर जीवन उसमें अवतरित हो गया? ये प्रश्न नहीं जिज्ञासाएँ है।
विज्ञान ने जाना कि धरती पर कई तत्व है। उसने एक सारणी बना डाली, तत्वों का वर्गीकरण कर डाला। तत्व के अणु खोजे फिर परमाणु का ज्ञान प्राप्त कर लिया। यहाँ नहीं रुका। उसने आगे खोजा प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रान। इसका विखण्डन कर लिया। पर यह उसके लिए अन्तिम सिरा साबित हुआ। वहाँ पहुंच कर वह यह नहीं जान पाया कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को केन्द्र में बैठा कर रखने वाली शक्ति कौन है और सृष्टि के आदि काल से आज तक इलेक्ट्रॉन को उसी एक ही स्पीड से कौन घुमा रहा है? उन कणों में कभी खत्म नहीं होने वाले विद्युत आवेश कहाँ से आए? ये अन्तिम कण भी फिर आखिर कण ही है। विज्ञान की जिज्ञासा यदि खत्म न हुई तो भी उसकी गति पदार्थ तक ही तो जावेगी। उपनिषद् इन जिज्ञासाओं के समाधान प्राप्त किए जा सकते हैं पर विज्ञान उसे मान्यता कह कर सहमत न हो सकेगा। वह यह नहीं मानेगा कि यही वह ब्रह्म है- सर्वं खल्विदं ब्रह्म। उसे यह साक्षात् देखा हुआ सत्य भी प्रमाणित नहीं लगता कि कण भी कण क्यों है, उसकी भवितव्यता भी ब्रह्म से ही है। नासतो विद्यते भाव नाभावो विद्यते सतः।
पेड़  जो कुछ दिखाई देगा वह सब का सब जड़ है। चेतन दिखाई नहीं देगा पर चेतना उसका गुण है, चेतन की स्फुरणा है।
क्रमशः

बच्चे का जन्म हुआ इसके पहले वह माता के गर्भस्थित भ्रूण था। भ्रूण भी जीवन का प्रथम अवतरण नहीं है। वहाँ जीवन का बीज शुक्र के रूप में आया है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्राणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ।। 1.1.8 ।। केनोपनिषद् ।।
जो प्राणका ज्ञाता,  प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है,  वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है। इस मन्त्रमें जिसकी प्रेरणासे प्राण चेष्टा युक्त हो कर विचरता है, वह कौन है इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है। सारांश यह कि प्राकृत मन तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं अतएव उनको ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता। इसलिये उनकी उपासना भी ब्रह्म की उपासना नहीं है। मन बुद्धि आदिसे अतीत परब्रह्म परमेश्वर के स्वरूप को सांकेतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरु ने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक,  प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है।

यह ब्रह्म‌ इन्द्रियों की पहुँच से परे है। न केवल यह कि इन्द्रियाँ वहां नहीं पहुँच सकतीं बल्कि यह भी कि इन्द्रियों द्वारा उसके स्वरूप को भी नहीं जाना जा सकता, उस शक्ति तक इन्द्रियों की पहुँच न होने का मतलब यह है कि उसकी प्राप्ति का साधन इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसके स्वरूप का ज्ञान न कर सकने का तात्पर्य यह है कि उसके स्वरूप, उसके गुण कर्म का विवरण नही किया जा सकता।
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शुक्राणु पुरुष में से आया है। अतः कहना चाहिए कि जो गर्भ माँ के उदर में प्रविष्ट हुआ वह पहले पुरुष के गर्भ में आया है। शुक्राणु भी जीवित कण है। इसे तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न कहा गया है लेकिन इस अन्न की सृजन क्षमता भी अकेले प्राणी में नहीं होता क्योंकि देह तो जीवन के बगैर स्थूल ही है।

इसे तैत्तिरीय अपनिषद् स्पष्ट करता है।
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः।। 2/1/3 ।।
उस इस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ है। वह यह पुरुष अन्न एवं रसमय ही है।
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।। 3/2/1।।
अन्न ब्रह्म है -- ऐसा जाना। क्योंकि निश्चय अन्न से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होने पर अन्नसे ही जीवित रहते हैं।
शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमनने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। 
शरीर अन्न का भोक्ता है। शरीर प्राण के आधार पर स्थिर हो रहा है और प्राण शरीर के आधार पर स्थित हो रहे है और वे एक दूसरे के अन्न हैं। और इस अन्न का परम कारण ब्रह्म है।
स्थूल शरीर जीवन का उद्गम नहीं हो सकता। जैसे नदी का तो उद्गम हो सकता है पर वह जल का उद्गम नहीं है।  वस्तुतः पिता और माता दोनों जीवन के पोषक है, उत्पादक नहीं। जीवन अनभिव्यक्त से अभिव्यक्त हुआ है। इस अभिव्यक्ति के उपकरण (इक्विपमेंट) है स्थूल पदार्थ। पदार्थ या पाञ्चभौतिक शरीर।  विकार अथवा कहें विकास उस जीवन के अवतरण के परिणाम हैं जो स्थूल में अवतरित हुआ है। यह भी सत्य ही है कि जीवन की अभिव्यक्ति प्राणी की देह ही है। इसके बगैर जीवन की अभिव्यक्ति ही संभव नहीं है।
इन बिन्दुओं से स्पष्ट है कि इस विकासशील भौतिक शरीर में जो चेतना है वह उस नित्य तत्व की लक्षणा शक्ति है जो हमें दिखाई पड़ती है। बबूल के बीज से वृक्ष का होना उस परम चैतन्य की लक्षणा शक्ति का ही तो आभास है। अौर उपरान्त में वृक्ष का मर जाना लक्षणा शक्ति का उपादान क्रम है। उसी प्रकार प्राणियों के जीवन का आभास भी है।
जीवन में जो अभिव्यक्त हो रहा है वह नित्य है। देह अथवा पदार्थ अनित्य है। इस अनित्य में जो अभिव्यक्त हो रहा है वह मैं हूँ, आत्मा हूँ। मैं वही आत्मा हूँ। मैं देह नहीं हूँ। यह जो अभिव्यक्त हो रहा है वह मैं हूँ। सोऽहं अस्मि।

रामनारायण सोनी

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