Monday, January 15, 2018

*विराट शून्य*- *एक आत्मबोध*

मौलिक कालचिन्तन
*विराट शून्य*- *एक आत्मबोध*

सारे अंक अपूर्ण हैं केवल शून्य ही पूर्ण है इसलिए हम समझ लें कि शून्य ही विराट है। शून्य न घटता है न बढ़ता है। अंक घटते बढ़ते हैं। हम शून्य को "कुछ नहीं" कहते हैं। परन्तु जिसे हम "कुछ नहीं" कहते हैं वही सब कुछ है। यह जो "कुछ नहीं" है वही शून्य है। अंकों के प्रारंभ होने के पहले शून्य अवस्थित है और नौ के परे होते ही फिर स्पष्ट शून्य है।
गौर से देखो शून्य अदृष्य रूप से सब के साथ जुड़ा है। जेसे एक धन शून्य बराबर एक। इस एक के हट जाने पर यह शेष शून्य ही रहता है यह भी शीघ्र ही समझ जाओगे। यह अंक मैं हूँ और मेरे साथ सदैव शून्य है। वह विराट सदैव अप्रकट रूप से मेरे साथ जुड़ा है। जब जब मैंने स्वयं को केवल अंक समझा तो शून्य को अलग समझा। यह मेरी समझ है पर यदि न भी समझूँ तो भी वह विराट बिना भेद भाव के नित्य मुझ से जुड़ा ही है। वस्तुतः आत्मबोध होना जरूरी है। जब मैंने अपनी हस्ती मिटा कर देखी तो विराट शून्य प्रकट आभास हो गया। अपूर्ण का आभास अदृष्य हो गया।
शून्य ही पूर्ण है। अंको के पहले भी, साथ भी, बाद भी; सर्वत्र शून्य ही शून्य है। यह अकाल ही शून्य है, यह शून्य ही विराट है। विराट ही पूर्ण है; पूर्ण ही विराट है, अनन्त है। कोई इसे विराग नहीं समझ ले पर यह मेरा अनुराग है। जब मैं उसके बगैर कभी हूँ ही नहीं हूँ तो निर्द्वन्द्व ही हूँ इसलिए खुद की क्या पर्वाह।

*मैं तो फक्कड़ कबीर की मानस संतान हूँ। उस परमपूर्ण परमात्मा ने सिर पर हाथ रख रक्खा है, उँगली पकड़ कर चला भी रहा है। मुझे जब नींद आवेगी तो उसकी गोद में चैन से सो जाऊँगा। तो भय की चर्चा कैसी।*

रामनारायण सोनी

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