Monday, January 15, 2018

कणिका

*क्षणिका*

सूरजमुखी उस चातक से बड़ा प्रेमी, साधक और तपस्वी है। चातक स्निग्ध चॉदनी का झरझर करता अमृत पीता है। रात गई तो सुख गया, आनन्द गया। फिर रात की तलाश होगी। आधी रातें तो काली होंगी, वे निखालिस होंगी। जानते हो सुख कब बीत गया? पता नहीं चलता। विरह एक वेदना है।
देखो! सूरजमुखी सूरज से आँख मिलाता है, खुद का सृजन भी करता है विकास भी करता है। सूरज रोज आता है बिना नागा किये। सूरजमुखी की सामर्थ्य समझो; फिर वह जब पक कर धरती पर झड़ेगा तो सैकड़ों नए तपस्वी खड़े करेगा। इसलिये तुम तपस्वी हो जाओ। तुम्हें तपन में जीवन ढूँढना है। सूरजमुखी बनना है।

रामनारायण सोनी

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