"बूँद की रग रग में पानी ही पानी है" इस बात को समझना आसान है बनिस्बत इसके कि पानी ही से बूँद बनी है या यहाँ पानी का वर्तमान नाम ही बूँद है। पानी से निकली बूँद जब पानी में मिल जाती है तो सबसे पहले उसकी संज्ञा "बूँद" ही समाप्त होती है पर तात्विक रूप से बूँद जो पानी पहले भी था अौर बाद में पानी नहीं बना रहा बल्कि पानी का मूल स्वरूप अपरिवर्तनीय है, वह केवल अभिव्यक्ति और बदली हुई संज्ञा पा गया था। बूँद खुद अपने आप को बूँद समझले तो भी वह पानी ही है। न माने तो भी पानी ही है। बूँद सदा नहीं है पर पानी सदा है। सागर भी हम ही कह रहे है परन्तु सागर भी बिना पानी कहाँ हो सकता है। वस्तुतः बूँद भी पानी है, सागर भी पानी है पानी में बूँद है, पानी में सागर है। पानी बिना न सागर है न बूँद है। बस यहाँ वहाँ पानी ही पानी है। पानी में ही बूँद भी है सागर भी है। सब ओत प्रोत है। अस्मिता पानी है अस्तित्व बूँद है, सागर है। अस्तित्व अवस्था है, अस्मिता आधार है अौर मूल है, मौलिक है। हमें दिखाई देने वाली वस्तु अस्तित्व है। अनस्मिता जो हम जाने नहीं है, तत्व वही है। बाजार में खरीदी हुई अंगूठी आभूषण है, हम उसे सोना समझ कर घर नहीं लाऐ हैं उसका वर्त्तमान "अँगूठी" के रूप में अस्तित्व बोध है। जब इसे तोड़ कर कोई अन्य आभूषण बनाया जावेगा तब अस्तित्व बोध ही रूपान्तरित होगा पर अस्मिता तो सोने की सदा रहेगी।
पानी जब वाष्पीभूत हो जावेगा तब क्या अस्मिता समाप्त हो जावेगी तब कुछ शेष नहीं होगा? पर ऐसा नहीं है। जब अस्मिता खोई हई लगेगी तब एक विराट शून्य उपस्थित होगा यह शून्य पूर्ण ही है। जो दृष्टिमान पानी था वह अवस्था बदलने से दृष्टिमान नहीं होगा पर वास्तव में तो वाष्य भी पानी ही है। परन्तु चिदाभास के उस पार खड़े होने से उसका "जल ही रहना" नहीं घट पाया। अर्थात् वह भी जल ही है। संज्ञाएँ अवस्थाओं की है। यह आभास द्वैत होने का है। जबकि जल किसी भी अवस्था में से विलग नहीं है। बूँद होना, लहर होना, सागर होना द्वैत का आभास है पर उसकें तात्विक स्वरूप में जल होना आभास नहीं सत्य है। आत्मा की उपाधियाँ चाहे जो भी रहै अद्वैत ही है।
वह तुरीय अवस्था है जब मैं का चिदाभास भी समाप्त हो जाता है। वास्तव में तो तुरीय शरीर की अवस्था नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों का आभास जाग्रत अौर स्वप्न तक ही रहता है जैसे बूँद का अौर सागर का आभास होता है। इनकी विस्मृति वास्तव में तो उनका मूलरुप से घनीभूत होना है। इस अवस्था के आगे मन अमन हो जाता है और साक्षी वहाँ उपस्थित रहता है। उसे सुषुप्ति की अवस्था के रूप में जानते हैं। जैसे जल वाष्पीभूत हो कर अ'स्मिता खोता हुआ लगता है वैसे ही जीवात्मा का मैं खो जाता है। फिर न तो स्थूल और सूक्ष्म शरीर रहता है और न अन्तःकरण के चारों वर्ग का ही बोध रहता है। माडूक्यू उपनिषद् में यहीं से तीसरी छलाँग तुरीय में है। यह ओंकार का चतुर्थ पाद है।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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