क्या कानून केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखता है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम से पीड़ित मानवता में मौजूद विद्रूप विषमताओं और संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
एक कविता
"सब दिन अच्छे बीते हैं"
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किसे कहें, कैसे जीते हैं
कुर्ता नहीं, ज़ख़्म सीते हैं
घर, टीन कनस्तर बजते
बाहर सब घट रीते हैं
अमृत देवों के हिस्से,
हम ज़हर छान पीते हैं
मौसम की क्या बात करें
दिन सब अच्छे बीते हैं
चल कबीर बजार चलें
घर में हिंसक चीते हैं
००० अरुण सातले
(उनकी गरिमामय फेसबुक वॉल से साभार)
(https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=955678644788096&id=100010379071458)
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मेरी नजर में..
कवि की एक अन्य प्रसिद्ध रचना की कुछ पंक्तियाँ हैं....
जब हवाएँ तेज चलती है
तो दीवार पर टँगे
केलेंडर के बारह महीने की
सभी तारीखें एक साथ
फड़फड़ाने लगती है
लगता है पूरा साल
ऐसे ही जायगा....
.. असमय"
यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर।
ऐसा कोई पिंजरा बना ही नहीं जो इस पंछी को अपने भीतर रोकने का सोच भी ले। यह काल है। इसने सबको देखा है। कविता का सृजक भी इस आलंबन को ले कर सब को देखता है। उसे मानव पर बड़ा वैषम्य और दैन्य दिखाई देता हैं। अभावों में पलता जीवन खाली खाली सा लगता है। इन अभावों को भरते भरते उम्र रीत गई पर वह ऐसे ही बीत गई। कविता इस संधि पर एक पल असमंजस में खड़ी हो जाती है। दिन अच्छी तरह बीत कर अच्छे हो गये या फिर अच्छा हुआ कि आज का यह दिन बीत गया परन्तु अगले ही पग पर उसे अपने दर्द की तुरपाई करता आदमी दिखाई देता है। समय आदमी को काट गया या कि आदमी समय काट रहा है। परन्तु थोड़ा आगे चलते हैं तो कुहासा छँटता है। इसलिये यह कहा जाना कि अच्छा हुआ यह दिन जैसे तैसे गुजर ही गया, सच लगता है। घर में खाली खाली बरतनों का शोर है। असल में बरतन तो खाली ही बजते है। इनका खालीपन जीवन के खालीपन को उजागर करता है।
एक हतभागी मानव का श्रम और कर्मफल कोई और ही उड़ा रहा है। मन्थन तो अनवरत चल रहा है पर अमृत कहीं और ही बँट रहा है। यहाँ तक तो ठीक था पर विडम्बना यह है कि जहर इस निरीह को पीना पड़ रहा है।
प्रत्यक्ष-दर्शी के रूप में कवि भी यह सब देख रहा है। यहाँ भितर-घात लगाए दिखते हैं लोग। जहाँ उसका दम घुटता है। यहाँ जहर घट-घट में घुला है। जाए तो जाए कहाँ।
अगली पक्तियाँ क्रान्त दर्शी कवि की है। वह पराये दर्द को अपने भीतर जीने लगता है फिर तो उसकी बात एक यथार्थ को उघाड़ती देती है। यह कविता पीड़ित मानवता की टीस को महसूस कराती है। यह वैषम्य केवल आज ही नही है, आज से भी नहीं है परन्तु कोई तो हो जो इस सत्य का समाज में रखने का साहस करे। सातले जी की लेखनी ने यह जोखिम उठाई है।
सादर
रामनारायण सोनी
28.01.2020
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