Wednesday, January 15, 2020

समीक्षा ५

डॉ जय वैरागी अपने सृजन में अनूठे प्रयोग करते हैं। इनकी रचनाओं में भारतीय जीवन दर्शन की गहरी छाप मिलती है और कविता  सकारत्मकता की ओर ले जाती है। प्रस्तुत है उनकी एक कविता जो उन्होने 2002 में लिखी है।
मै  नए  युग  का पुरोधा
युग  बदलना  जानता  हूँ
वक्त    की    धारा  की  हर
तासीर  को   पहचानता हूँ

सृजन  और  विध्वंस  के मैं
गीत  युग  से गा  रहा  हूँ
बह  रही  धारा  के  संग  संग
मै भी बहता जा  रहा  हूँ

पर  अटल विश्वास  की
चट्टान  सा  पथ  में कही
जब पडा  गढना मुझे
नव  शून्य  मैं बनता  वही ।।

मील  का   पत्थर  स्वयं को
हर  दिशा  मै  मानता  हूँ   ।।

नव सृजन नव चेतना का
जब कभी  आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा

जब मरुथल  में हरापन
ढाँक लेगा लाज को
रेत की स्वर रागिनी भी
साथ देगी साज को

शंख की जब गर्जनाएँ
युद्ध मे उदघोष देगी
दण्ड की नियमावली में
कौरवों को दोष देगी ।।

नैपथ्य में गांडीव सा प्रण
मैं कही जब तानता हूँ
मैं नए युग का पुरोधा
युग बदलना जनता हूँ  ।।

      डॉ. जय वैरागी
        2002

🌹🌷🌹🌷🌹

"मेरी नजर में"

कविता का अंश

"नव सृजन नव चेतना का
जब कभी आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा"

कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है।
जो लोग पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझते है सृजन की सामर्थ्य केवल उन्हीं में है। वे ठूँठ में से नवपल्लव उगाते है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के छह इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। कुछ समय बाद उसमें फल आने शुरू हो गए। विध्वंस के बाद भी नव सृजन की अपरिमित संभावनाएँ मौजूद हैं।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के  फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज ही है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे, अमूर्त आशाएँ साकार होंगी । चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास ही है, प्रकृति का स्वाभाविक सृजन है। प्रकृति की यह सृजन प्रक्रिया जगत में जीवन की संचेतना है। कविता आगे न सिर्फ अनूठे परिदृष्य निर्माण करती है अपितु वह नित्य निरन्तर अग्रसर होने को कहती है।

"सृजन और विध्वंस के मैं
गीत युग से गा रहा हूँ
बह रही धारा के संग संग
मै भी बहता जा रहा हूँ"

परमाणु युद्ध की भीषण त्रासदी मानव इतिहास की सब से वीभत्स घटना है। जिसने न केवल सम्पदा को विनष्ट किया बल्कि बचे खुचे जीवन को पीडाओं के अम्बार में धकेल दिया। इस  विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा हुई होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये।
इसलिये अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये। मृत्यु से अमरता की ओर गमन कीजिये।
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।

रामनारायण सोनी

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