Sunday, June 17, 2018

मेरी बात


    *मेरी बात*

मेरे प्रिय आत्मन्!

मैं शाजापुर जिले के एक छोटे से गाँव मकोड़ी में जन्मा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा परिवार आध्यात्मिक भावनाओं और विचारों से लबरेज था। काका श्री मानस मर्मज्ञ और पिता वेद पाठी थे। तत्कालीन ठेठ गाँव का परिवेश और उसमें रचे बसे सुरम्य ग्राम्य जीवन की मनमोहक छटा की याद सचमुच मुझे आज भी गुदगुदाती है। प्रकृति की गोद में खेलता जीवन और चारों दिशाओं से आम्रकुंजों से घिरे हुए गाँव की छबि आज तक मेरे मन में बसी हुई है।
मेरी दादी सूरज बाई अौर माँ दरियाव बाई रात्रि के अन्तिम प्रहर में उठ कर चक्की पीसते हुए समवेत स्वर में पारंपरिक प्रभाती और भजन गाती थी जिनके भावों को लेते हुए कुछ रचनाएँ इस काव्य संग्रह में सम्मिलित हैं। साथ ही उन संचित भावों का आध्यात्मिक प्रभाव मेरे जीवन सदैव रहा है। मेरी हायर सेकण्डरी की पढ़ाई शाजापुर में हुई। जिस मकान मे मैं रहता था उसके मालिक श्री रमेशजी वर्मा  नगर पालिका शाजापुर की लायब्रेरी के लायब्ररियन थे। वे मुझे शाम को अक्सर लायब्रेरी ले जाते थे। वहाँ मैने मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, वृन्दावनलाल वर्मा आदि कवियों, लेखकों के साहित्य को पढ़ा। सन् १९६६ से यह सब छूट गया। बाद के वर्षों में यदा कदा कुछ लिखता रहा। लेकिन इन्जीनियरिंग की पढ़ाई और तकनीकी सेवा में रहते हुए हिन्दी साहित्य से लगभग कटा रहा। सेवा निवृत्ति के प्रश्चात् २०१२ में ईश्वर की अनुकम्पा से साहित्य के पड़े वे बीज पुनः अंकुरित होने लगे। सन २०१३ में मेरी प्रथम पुस्तक "पिंजर प्रेम प्रकासिया" अौर २०१५ में  "जीवन संजीवनी" प्रकाशित हुई। ये कृतियाँ गद्यात्मक हैं। सन् २०१५ में एक सुखद संयोग हुअा कि मैं "रोटरी काव्यमञ्च" अौर "इन्सा, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर" से जुड़ा जहाँ श्री आशीष त्रिवेदी, श्री कृष्णलाल गुप्ता, डॉ श्री रवीन्द्र नारायण पहलवान, डॉ श्री कीर्ति स्वरूप रावत,  श्री वेद हिमांशु, डॉ श्री जवाहरलाल गर्ग, श्री आशीष शुक्ला, श्री अज़ीज अन्सारी जैसे वरिष्ट रचना धर्मियों का सानिध्य, प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मिला। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में वे लोग हैं जो मेरे इस प्रयास में सहभागी रहे हैं, मैं अभिभूत हूँ और उनका कृतज्ञ हूँ।

जब भाव गहराते हैं तो शब्द नहीं मिलते और शब्द ढूँढते ढूँढते भावों की श्रृंखला बिखर जाती है लेकिन इन दोनों का मेल कभी कभी कुछ पलों के लिये हो जाता है तो कविता जन्म ले लेती है। मेरे साहित्यिक गुरु डॉ रमेश सोनी का कहना है कि कविता की नहीं जाती है वह तो हो जाती है। उन्होंने एक प्रयोग और करने की भी सीख दी थी कि शब्दों में भाव पिरोने के बजाय भावों को शब्दों में निरूपित करने का प्रयास करें।
इस काव्य संग्रह का बीज रूप ये पंक्तियाँ -
जैसे नेपथ्य से उभर कर आई,
किसी अनजान पवित्र रूह ने
अन्तस में इस तरह गुनगुनाई
कि मैं अभिभूत हो गाने लगा
और वे ये शब्द अक्सर मेरे मन मस्तिष्क में तैरने लगते हैं।
*"चुपके चुपके कुछ कहते है
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे हैं ऐसे ही
देखो ये शब्द हमारे"*

इस संकलन में कुछ अटपटी, लटपटी कविताएँ संग्रहित हैं। जब जब जो जो मन में आया लिख लिया। कविता की शास्त्रीयता, छन्द विन्यास, गीत, रस-अलंकार का मैं जानकार नहीं हूँ इसका आभास पाठक को जहाँ-तहाँ हो जाएगा। इस संकलन में सन् १९८५ से अद्यतन रचनाएँ सम्मिलित हैं।
जिन्दगी के आयाम अनन्त हैं। किंचिद् भावनाओं के रंग कलम की कूँची में पड़ गए और पृष्ठों के कैनवास पर सहज में उतर आए हैं इसलिए कदाचित् काव्य कलात्मकता का अभाव खल सकता है।
अपने सेवा काल में प्रत्यक्ष देखे गए सामाजिक, मानवीय सुख-दुःख, पीड़ा, करुणा, पर्यावरणीय परिवेश अौर उनकी अनुभूत संवेदनाओं के कुछ पलों की अभिव्यक्ति किंचिद् रचनाओं में झाँकती नजर आएगी।
"जिन्दगी के कैनवास" में संकलित नायिका प्रधान रचनाओं की भावात्मक पृष्ठभूमि मेरी सहधर्मिणी श्रीमति शकुन्तला सोनी की हैं जिनके शब्द मैंने दिए हैं। उनकी इस सहभागिता पर मैं गर्वित हूँ।
लोग कहते हैं कि आज कल मोबाइल का प्रयोग जीवन में बहुत बढ़ गया है जिसके कारण लोग अति व्यस्त हो गए हैं। यहाँ इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि इस संकलन में से ८० प्रतिशत रचनाएँ मोबाइल पर ही लिखी गई है। इनमें से रचनाओं के कुछ अशों का चित्रात्मक ग्राफिक्स का अंकन भी मोबाइल पर ही किया गया है। वाट्सएप ग्रुप "शब्द-धरा वनांचल" के सदस्य डॉ जय वैरागी, डॉ सीमा शाहजी, श्रीमति भारती सोनी ने मेरी काव्य यात्रा में प्रोत्साहन और मार्गदर्शन का कार्य किया है। मैं उनका भी हृदय से आभारी हूँ।
"जिन्दगी के कैनवास" के संपादन का जिम्मा वरिष्ट कवि एवं रचनाकार श्री आशीष त्रिवेदी ने ले कर उसे बखूबी निभाया है जिससे यह संकलन आपके हाथों में आ सका है। उनके इस कार्य से मैं अनुग्रहीत अौर उपकृत हूँ।
आशा है कि "जिन्दगी के कैनवास" के रूप में इस कृति को पाठकों का स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा।

रामनारायण सोनी

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