सम्पादकीय
*"जिन्दगी के कैनवास*"
"मन बोले मन सुने, प्रीत की परिभाषा है
भावों का व्यापार चल पड़े,
प्रीत की अभिलाषा है।" जिन्दगी के कैनवास से।
श्री रामनारायण सोनी का यह काव्य संकलन संभावनाओं एवं इन्द्रधनुषी रंगों का यथेष्ट समायोजन है।रचनाकार के मनोभावों को प्रकट करती यह कृति विभिन्न विषयों पर अपना प्रभाव बनाती है।
अपने अपने समय काल में हिन्दी साहित्य में कवियों ने अपनी रचनाओं से साहित्य आकाश को आलोकित किया है एवं हिन्दी भाषा को विश्व की श्रेष्ठतम भाषाओं में उत्तम स्थान दिलाया है। माँ वीणापाणि की आराधना अनादि काल से चली आ रही है। बिहारी, कबीर, सूरदास, तुलसीदास, जायसी जैसे कवियों ने कविता को दोहे, चौपाई और छन्दों में बाँध कर अपने श्रेष्ठ क़वित्व का परिचय दिया। कालान्तर में जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, रामधारीसिंह दिनकर; ये सभी साहित्य के पुरोधा रहे। उनके द्वारा अपने समय काल एवं युग के अनुकूल उन्होंने रचनाएँ की। परम्परागत लेखन कार्य हर काल-खण्ड में जारी रहा जो कवि, लेखक रचनाकारों को उद्वेलित करता रहा था। समय परिवर्तन के साथ साथ लेखक, कवियों, साहित्यकारों की रुचियों में भी परिवर्तन होने लगे। आज का यह समय पठन पाठन के दृष्टिकोण से सम सामयिक विषयों को प्रधानता देता है। कवि अपनी रचनाओं में हास परिहास, श्रृंगार, धर्म, कर्तव्य, प्रकृति चित्रण आदि पर अपनी रचनाएँ लिख रहे हैं।
जिंदगी के कैनवास में कवि श्री रामनारायण सोनी ने अपने मनोभावों को इन पंक्तियों में व्यक्त क्या है।
"कूचियाँ उठाता हूँ मैं रेशमी रंगों भरी
बिखरने लगती है इंद्रधनुषी छटा
समाहित हो जाती है पल पल की धड़कनें कैनवास पर खुद ही उभर आते हैं नूतन चित्र"
इन पंक्तियों में कैनवास को कवि द्वारा विस्तृत स्वरुप प्रदान किया है जो पुस्तक का शीर्षक भी है एवं सर्वथा उचित भी है।
श्री रामनारायण सोनी की कविताओं में आध्यात्मिकता का समावेश भी कहीं-कहीं प्रकट होता है जो उनकी धार्मिक भावनाओं को दर्शाता है। यह भावना कवि की निम्न पंक्तियों में परिलक्षित होती है।
"उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
तू क्षीर सिंधु स्नान किए जा
रे मन मधुप मौन तू रह कर
प्रभु पद पद्म पराग पिए जा।"
श्री सोनी की रचनाओं में उनकी इंजीनियरिंग शिक्षण का तकनीकी प्रभाव नहीं दिखता अपितु एक तपस्वी के तप का भाव प्रकट होता है। आप कहते हैं-
"अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिमाच्छादित शैल शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर
इन सबका तू शिल्पकार है।
तेरी महिमा अमित अपार है।।"
कवि की स्वयं यह मान्यता है कि उन्हें कवित्व की प्रेरणा कहां से आती है? वह उन्हें ज्ञात नहीं है परंतु वह रचना पूर्ण कर जिस प्रकार सिंधु में आनंद का रसपान करवा रहे हों; वैसी अनुभूति होती है।
श्री सोनी वैश्विक शांति की भावना भी रखते हैं जो उन्हें सामाजिक उत्थान से जोड़ती है। महसूस करो कविता की ये पंक्तियां "मैं कोई जिस्म नहीं हूं, छुओ नहीं महसूस करो"। उनकी आध्यात्मिक विचार धारा को पुष्ट करती है।
कवि प्रेमी हृदय की व्याख्या इस प्रकार करते हैं "खुले नयन से गहन गगन से
अंतरतम के सरल सृजन से
स्वर्णिम यादव की कड़ियों को
अवगुंठन में बांध लिया है"
कवि के मन में प्यार की भावना इन शब्दों में व्यक्त होती है-
"तुम्हारे प्यार से जिंदगी ने पाया है
तुमने ही मुझे तूफानों से लौटाया है"
कवि ने उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दावली का भी सुंदर उपयोग किया है। आकाश की कल्पना में कवि कहते हैं उनसे अनगिनत आशाएं भर डाली हैं जो उनकी पॉजिटिविटी को बढ़ाता है।
उन्होंने मां की महिमा को बताते हुए कहा है कि "जग का पूरा शब्दकोष ही
प्रथम तुझे ने दिया मुझे था"
आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी कवि ने उठाया है जो समसामयिक है। उपमा अलंकार की छवि इन पंक्तियों में मिलती है-
"यादों के बिछौने पर मन करवट लेता है
कभी तपती धूप का दुशाला बनाकर ओढ़ता है"
प्रकृति के प्रति संवेदनशील कवि कहते हैं
"आज पावस मन मयूरी को रिझाने आ गई है"
इसमें उनकी मनोभावना बड़ी प्रबल है।
भावनात्मक रूप से कवि की कल्पना में एकाकीपन को इस प्रकार चित्रित किया है-
"यह कैसा अकेलापन
जहां सन्नाटे चीखते हैं
मौन मरघट में खड़ा है।"
घरों में आती सोन चिरैया भी कवि को मोह पाश में बांध लेती है। चिड़िया के स्वभाव को भी उन्होंने पढ़ने का प्रयास किया है-
"तिनका तिनका चुनकर मैंने
नन्हा सा था नीड़ बनाया
नीचे बगिया महक रही थी
चंचरीक था संग संग आया"
सभी रचनाओं में सकारात्मक भाव है जो कविताओं को जीवंतता प्रदान करते हैं। कुछ जगह आंसू, संवेदना, धड़कन जैसे विषय स्वयं बोलते हैं। अपनी कविताओं में प्रयुक्त शब्दों की तुलना उन्होंने आसमान के झिलमिल तारों के समान की है जिसमें "भाव भरे हैं शब्द" को प्रमुखता दी है।
अंतरात्मा की आवाज को कभी कवि ने कभी मौन नहीं किया है, वे कहते हैं- "मुझे याद करना, मैं जलने को तत्पर हूं।" इन भावों में छुपा दर्द कई कहानियाँ समेटे हुए प्रतीत होता है।
लयबद्धता भी कुछ कविताओं में बहुत सुंदर रूप से चित्रित है जो कविता को गेय बनाती है।
जीवन की व्याख्या कवि इस प्रकार करते हैं
"स्वास मेरी तुम स्पंदन हो
तुम मेरे ही वृंदावन हो
प्रेम चुनरिया ओढ़ फिरू मैं
तुम मेरा जीवन धन हो।"
श्री सोनी जी वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास रखते हैं एवं उनकी विचारधारा में
"भावों का व्यापार चल पड़े, यही प्रीत की अभिलाषा है।" सबको साथ लेकर चलने वाले वे स्वयं एक विद्वान, मृदुभाषी, सत्यनिष्ठ व्यक्ति सरलता, सहजता उनके स्वभाव का अंग है। "विद्या ददाति विनयम्" उनके जीवन का फ़लसफ़ा है। इंजीनियर, जीनियस एवं सौम्य व्यक्तित्व के धनी श्री रामनारायण सोनी को उनके इन कविता की लाइनों में पढ़ा जा सकता है
"वादियों में है मेले खुशबू के
बगीचों में ना लग जाए कहीं नजर
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊं
तेरा लौट आना लाजमी है!"
मैं उनको उज्जवल साहित्यिक यात्रा की शुभकामना देता हूं।
इन्दौर, आशीष त्रिवेदी
दिनांक... 121, सरजू प्रसाद मार्ग
इन्दौर, 452001•
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