समीक्षा १
*नयनो में बसती गयी छवियां लेकर मर्म।*
*प्यासी है संवेदना प्यासे अपने धर्म।।*
धर्म आत्म आधार है , चेतना मन अविचल ।
निर्झर है परमात्मा निर्झरणी कल कल
हलचल स्पंदित हुई संघर्षों की ओट ।
मेरे मन पर चोट है तेरे मन मे खोट ।।
डॉ जय वैरागी
18.11.2019
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मेरी नजर में
मैं दर्पण के सामने खड़ा था। मुझे मैं ही देख रहा था। मैं अपनी छबि देख रहा था पर एक इससे बड़ा मर्म यह था कि छबि मुझे ही देख रही थी। मैंने अपनी उस छबि से कभी नहीं पूछा कि उसने मुझमें क्या देखा? यदि मैं ऐसा कर पाता तो मैं कबीर हो जाता। "जो दिल खोजा आपना"।
यह सच ही है कि मेरी खोज मुझ से बाहर ही बाहर है। क्योंकि छबियाँ सारी नयनों के द्वार पर अटकी रह गई। अगर वे दिल में उतर जाती तो असर कर जाती।
एक फिल्मी गीत है-"आँखों से जो उतरी है दिल में, तसवीर जो उस अनजाने की" आगे के बोल एक गहरी संवेदना की अनुभूति है।
वस्तुतः संवेदना की प्यास अभी बुझी नहीं है। प्यासी संवेदनाएँ अनुभूति कैसे पैदा कर सकती हैं? जैसे एक पशु मैदान में चर रहा होता है और यदि उसके पास कोई अन्य पशु मरा पड़ा हो तो भी चरने वाला पशु चरता ही रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि वहाँ चरने वाले पशु की संवेदना ही मरी पड़ी है। संवेदना नहीं तो अनुभूति नही। संवेदना की अपनी प्यास है। यही मर्म है।
फिर हुआ यूँ कि मैं आइने के सामने से हट गया। मेरे हटते ही मेरी छबि दर्पण से हट गई। अजीब बात है। परन्तु अब मुझे समझ में आ जाना चाहिये कि मैं अपनी छबि लेकर आया था और मेरे हटने सिद्ध हो गया कि मेरी छबि भी मेरे साथ ही चलती है। और तब उस दिन यह मर्म भी समझ में आ गया कि मेरे मर्म भी मेरे साथ ही चलते हैं। लेकिन इसमें संवेदना की प्यास बनी रहना भी जरूरी है। संवेदना हृदय का धर्म है, बोले तो "दिल दा मुआमला है"। हृदय का अप्रतिम लक्षण और शस्त्र है संवेदना। हृदय की प्यास संवेदना की प्यास है और संवेदना की खोज छबियों में होनी चाहिये।
लेकिन फिर जब दर्पण के सामने तुम आओगे, वहाँ तुम्हारी अपनी छबि होगी। मेरी तरह तुम खाली मत लौट जाना। अब वहाँ मेरी नही तुम्हारी छबि है। उसमें संवेदना की तलाश करना। धर्म के मर्म को खोजने का प्रयत्न करना। इस बार एक अनुप्रयोग कर के देखना। अभी तक तुम उससे पूछते रहे हो कि मैं कैसा लग रहा हूँ? अब की बार वह तुमसे पूछेगी कि तुम कैसे लगते हो? तुम्हारा अपना जवाब तुम्हें अंदर तक हिला कर रख देगा। डरना मत। ये जागी संवेदनाएँ तुम्हें आत्मीय अध्यात्म से परिचय कराएँगी। धर्म का पिपासु असल में अध्यात्म का पिपासु है। धर्म की मेन रूट अध्यात्म के गहनतम सागर में होती है।
रामनारायण सोनी
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