*वो पिता ही होता है*
जो दुख दर्द को हरदम पीता है
ग़म !खाता ग़मज़दा नहीं होता
वह पिता ही होता है ........!
उसके दुख दर्द का पता सबको होता है ........
लेकिन !महसूस! कौन करता है....!
हाँ !वह अकेले में रोता है
आसुओं को पीकर भी बाहर से
खारा !ओर अंदर से "मीठा"ही होता है
वो !पिता ही होता है ..... .!!
सब ! सब कुछ !" सब "को देने की चाहत में .......!
मैं ! मेरा !अपना !सब कुछ दे चुका होता .....
वो ! पिता ही होता है .......!!
बस ! एक शब्द ! सुनकर बेहद ! दुखी...
विचलित !होता .......!
क्या ! किया आपने "हमारे"लिए....?
शायद !यही "सुनने" के लिए ...
उम्रभर ! मर-मर के जीता है
जीते !जी मर के भी जीता है .....
वो ! विष !पीकर भी ...
जीता... है
वो ! पिता ही होता वो पिता ही होता है .........!!!
बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़✍🙏
*मां*
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माँ !शब्द नहीं ......
शब्द !कोष है .......!
अंत !नहीं प्रारम्भ है
अनन्त !स्वरूप !अनन्त ऋचाएं...
मूलतः मां ......
सिर्फ !मां है.........!!
नन्हा !सा शब्द "मां" .......
शब्द !नहीं शब्द ! सागर है .... .!
मां !गागर !में सागर है ....
मां !श्रष्टि में श्रेष्ठ ! श्रेष्ठतम ....
सुख !सागर है .......!!
दया !ममता !करुणा!त्याग!
निस्वार्थ!भाव -भावना का
महा!सागर है........!!
तारक!है उद्धारक है ......!
मां...........!!
मां !है तो संसार है संस्कार है ....!
मां ! भाव !नहीं भव सागर है....!!
मां !तुझे प्रणाम ........!
प्रणाम !मां......!!
बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़
🌹🌹🌹🌷🌷🌷🌹🌹🌹
सर !कविता में "गरीबी और बेबसी"को मैंने भी प्रत्यक्ष भोगा है
जँहा तक मुझे याद है 1975-76 वर्ष में मैं स्वयम 36 किलोमीटर सायकल से आना जाना( आयुध कारखाने में
ठेकेदार के पास मात्र!तीन रुपये दिन की मजदूरी करता था )
इन्ही संघषों के साथ एम ए समाज शास्त्र का अध्ययन पूर्ण किया बाद में लक्ष्मी जी सरस्वती जी की कृपा से अच्छी नोकरी मिली और बेहतर जीवन जी रहा हूँ लेकिन "वो"पल संघषों का
आना जाना आज भी इंशानियत
के मर्म को समझने में प्रेरक रहा है
यही कारण है कविताओं में मानवीयता का पीड़ित भाव संवेदना अतिसंवेदना के रूप में
शब्दों और भाव भावनाओं में
साकार अनुभूति का प्रतिबिंब
उभरता है आप एवम ग्रुप के
सभी साथियों का उत्साहवर्धन
हमेशा प्रेरित करता है जो भी
लिखू "अतिरंजित"न लगे
आप सभी का विनम्र सादर आभार
🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷
प्रिय श्री गुहा जी
समाज के वैषम्य और दैन्य को उघाड़ती कविता, मर्म को भेदती कविता, पर पीड़ा को अनुभूत करती कविता, कवि के व्यथित मन को उद्घाटित करती कविता है यह।
कहते हैं कि कविता कवि के हृदय की अनुकृति है-फोटो कॉपी है। काव्य के मनु कहे गए वाल्मीकि का हृदय भी क्रोंच की पीड़ा का आत्मानुभूत कर गया था और तब से सृजन का यह संसार चल पड़ा। सृजन धर्मा उनके वंशज हैं।
आप भी इसी अनुक्रम में सज्ज हैं।
साधुवाद
रामनारायण सोनी
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