पूछा उन से
आवाज खोकर मृत हो गए
पटाखों से पूछा ....
रंग खोकर भी बच गए
कुमकुम से पूछा ....
बची खुची दीपावली का हश्र ...?
बोल नही पाया
दम तोड़ चुका पटाखा
दम तोड़ चुका रंग
बस इतनी ही आवाज आई
बुझ रहे दीपक से
दीपावली बीत गयी
बचे खुचो का तो
यही हश्र होता है .....।
🌹🌹🌹🌹🌹
मेरी नजर में
नियति ने कुछ युग्म बनाए हैं। सुख दुःख, जन्म मृत्यु, ऊँच नीच, अच्छा बुरा वगैरा वगैरा। सिक्का है तो दो पहलू है। एक तरफ मूल्य लिखा है तो दूसरी तरफ राष्ट्र की कोई पहचान। वैसे ही कविता कुछ सूत्रों की तरह होती है जिनका कलापक्ष लगभग स्थिर होता है पर भावपक्ष विभिन्नता लिये होता है। जैसे "शाम हो गई है" अर्थ देती है कि सूरज डूब गया है। भाव देती है कि दिया जलाओ, रात होने को है, वक्त अब विश्राम का आ गया है आदि आदि। आसमान में घिरे बादल बाढ़ का संदेश भी देते हैं पर उसका जल जीवन भी है।
इसी तरह उक्त कविता के दूसरे पहलू में छिपे उन भावों को उघाड़ने का प्रयास है जो हमारी अपेक्षाएँ और सीख भी है।
पटाखे, रंग और दीपक के माध्यम से संकेत है उनकी अपनी अस्मिताओं का, संबंध है उनके नैसर्गिक धर्म का, परिणति है उनके नैमित्तिक भाग्य का।
लेकिन एक सुखद संदेश है वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हैं। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने के भीतर से उसमें उसका रस एकात्मकता लिये हुए है पर इसी रस के निकल जाने पर अवशेष सिर्फ ईंधन बन कर रह जाता है और अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद श्री हीन हो जाता है। रस को यदि मूल्य समझा जाये तो उस से प्राप्त मिठास नाम के दूसरे पहलू को भूलना ठीक नहीं है।
दीपावली एक उत्सव है, एक सुअवसर है। पटाखे, रंग और दीप साधन हैं आनन्द और उत्साह प्रकट करने के । इन तीनों के बगैर दीपावली महज एक पर्व ही रह जाएगा पर उत्सव नही बन पाएगा। जैसे भी हो यदि अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी इन साधनों ने परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि हताशा के।
फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। हमें उल्लास दे कर वे उल्लसित हैं। कहने को वे चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः मेरे मन्तव्य में मनोयोग को यू टर्न नहीं लेना चाहिये था अपितु रचनाकार को कृतार्थ होने का अनुभव करना चाहिये था। क्योंकि जो जो जिस जिस प्रयोजन से बना था वह पूरा हआ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।
अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।
सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।
रामनारायण सोनी
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