समीक्षा ५
*परिवर्तन*
सांझ की धूप ने करवट ली
धुंधलका जाने को तैयार
जल उठेंगे
दीप सहस्त्रों
मिटाने को तिमिर
प्रकाशित करेंगे विश्व को
समेटेंगे अंधकार को
लेकर अपने आगोश में
भर देंगे नए उजास को
यही क्रम दोहराएगी सृष्टि
यही परिवर्तन का है आधार
यही निरंतरता का क्रम
गतिमान है
सत्य है
नित्य है
आशीष त्रिवेदी
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मेरी नजर में
दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोड़े आहिं॥
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूदि चढि जाहिं॥
अर्थ
रहीम कहते है कि देाहों में भले ही असर कम हो परंतु उनके अर्थ बड़े ही गूढ़ और दीर्घ होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई नट अपने करतब के दौरान अपने बड़े शरीर को सिमटा कर कुंडली मार लेने के बाद छोटा लगने लगने लगता है।
पहले तो बड़ा अटपटा सा लगा कि क्या रिश्तों के भी बीज हो सकते हैं? लेकिन धीरे धीरे लगा कि रहीम ने यों ही नही कहा होगा "दीरघ दोहा अरथ के"।
"सांझ होने को है।" कहने को तो यह एक कालखण्ड का संकेत है पर इसके पीछे कई और अनुक्रम जुड़े हैं। कुछ शब्दार्थों की तरह लगा तो कुछ लक्षणा शक्ति की तरह। यथा- दीप जलेगा, संध्या वन्दन होगा। गौएँ अपने खूँटों पर पहुँचेगी। गोवत्सों को माँ और मातृत्व प्राप्त होगा। दीपों के जलने पर अंधकार दूर होगा।
एक फसल रिश्तों की होगी दूसरी भावों की होगी, संवेदनाओं की होगी। रिश्तों के बीज सा एक बीज यह भी है। रिश्ते भी उगते हैं। सांझ के धुँधलके का बीज कितने आयामों के द्वारा खोलता है। बीज का उपाख्यान केवल खुद के उग जाने से पूरा नहीं होता वरन वह बहुगुणन भी करता है अपने कई प्रतिरूपों में। रिश्ते भी बहुगुणन करते हैं बीजों की तरह। जैसे बेटी ब्याह कर जाती है जवाँई के संग। यह बीजकृत रिश्ता है। पर इस रिश्ते के माध्यम से वह अनेक रिश्तों का एक नया ससार खड़ा करती है। कुछ रिश्ते वह अपने लिये और कुछ अपनों के लिये तैयार करती है। सच है एक रिश्ते का बीज बोया तो कई और रिश्तों की फसल उग आती है।
जब दीप जलेंगे तो अन्धकार खुद को समेट कर अलग बैठा होगा। यह दीप के साहस का सम्मान है पर दीप से अन्धकार का अटूट रिश्ता भी है। वह इतना दूर भी नही जावेगा कि फिर लौट न सके। अन्धकार और दीप के बीच उजास एक और रिश्ता बन कर खड़ा है जो रिश्तों का विकास भी है। यह "उजास" एक नया रिश्ता है। कविता में यह रिश्ता नेपथ्य से झाँकता नजर आता है।
यह सच है कि सृष्टि अपना यह क्रम अनवरत दोहराएगी। उजास समय की माँग के अनुसार आवेगा फिर अपना प्रयोजन पूरा होने पर चला जावेगा और पुनः पुनः लौट कर आवेगा। परिवर्तन होगा पुनरावृत्ति की शक्ल में। रिश्ते फिर कायम होंगे।
सृष्टि तीन कालों में आबद्ध है। उत्पत्ति, पालन और लय के तीन चरणों व्यवहृत है। घटना क्रमों में कार्य का गतिशील होना उसके विकास की धारा सुनिश्चित करता है। समस्त सृष्टि अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। आदि से लय के बीच गतिशीलता होती है, निरन्तरता होती है। जो नित्य नही है वह निरन्तर है। सत्य ही नित्य है।
जिस प्रकार नेपथ्य में खड़े सूत्रधार रंगमंच के संपूर्ण परिदृष्य गढ़ता है वैसे ही कविता अन्दर बाहर को समन्वित करती है। अध्यात्म से अधिभूत को जोड़ती है। अपना उद्देष्य पूरा करती है।
रामनारायण सोनी
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