Friday, January 17, 2020

समीक्षा ७

एक कविता डॉ जय वैरागी की। श्वासों की अल्पता और प्राणों का कल्प। चिन्तन के दार्शनिक आयाम।

सत्य की आहुतियों को जानिए
राख है ,भभूतियों को जानिए
साधना उपासना में जब जली
आत्म की अनुभूतियों को जानिए।।

*प्राण के इस कल्प को पहचानिए*
*सत्य के संकल्प को पहचानिए*
*है यहां निर्धारणा में गिनतियाँ*
*श्वास कितनी अल्प है पहचानिए।।*
                  डॉ जय वैरागी

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मेरी नजर में

प्राणों की उपासना

साँस आती है, साँस जाती है। यह क्रम-अनुक्रम लगातार है। जीवन चलता ही जाता है। बस एक बार जा कर नहीं लौटी तो जीवन भी लौट नहीं पाता है। 
यह सत्य है। सत्य का विकल्प नहीं है केवल संकल्प है। लोग अक्सर इस सच को लिखने पढ़ने और सुनने से भी डरते हैं। एक पक्षी होता है शुतुर्मुर्ग, सब पक्षियों में अधिक ऊँचा, विशालकाय। इतना सक्षम कि वह जमीन पर चालीस किलो मीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से दौड़ सकता है लेकिन जब उसे किसी तरफ से बहुत डर लगता है तो वह अपना सिर रेत में धँसा कर छिपा लेता है और समझ लेता है कि अब वह सुरक्षित हो गया है। क्या यह विकल्प है? नहीं यह कोई विकल्प नही है।
प्राण अमूर्त है किसी ने देखा नही। साँस के नेपथ्य में बस प्राण है, वही जीवन का सूत्रधार है। प्राण है तो चेष्टा है, चाह है, पहचान है। जीवन का अस्तित्व ही प्राण से है। परन्तु केवल आती जाती ये साँसें ही जीवन का आधार नहीं है। यदि इसमें प्राण न हो तो शरीर निरी धौंकनी भर है। जीवन की सार्थकता प्राण से है। जिसने प्राण के इस कल्प को पहचाना उसने ही जीवन के महान सत्य को जाना है। इसलिए सत्य को जानिये, संकल्प को पहिचानिये।
दोहा :
'रामु सत्य संकल्प' प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
            ।।सुन्दर काण्ड।।
साँस कितनी आई कितनी गई इसकी गिनती उम्र हो सकती है लेकिन इस गिनती के उस पार जीवन के यथार्थ में बस प्राण ही की चेतना है। साँस की शक्ति अत्यल्प है। शक्तिमान तो प्राण है। लेकिन इन सब से बड़ी इस प्राण की वह शक्ति है जिससे प्राण जीवन के परम स्रोत से प्राणित है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
(केनोपनिषद् 1/8)
जो प्राण के द्वारा प्राणित (चेष्टावान) नहीं है, बल्कि जिससे प्राण अनुप्राणित (चेष्टायुक्त) होता है, उसी ब्रह्म को तू जान। उसे नहीं जिसकी यह संसार उपासना करता है॥
वस्तुतः साधना और उपासना मात्र से उस परमात्म शक्ति को जान पाना भी मंजिल नही पर मार्ग अवश्य है।परमात्म सत्ता वह एक आत्मानुभूति है। अनुभूति निःशब्द है, गूँगे का गुड़ है। इसलिये...
साधना उपासना में जब जली 
आत्म की अनुभूतियों को जानिए ।।
और
सत्य की अनुभितियाँ जीवित रहे 
भ्रमण इस मरघट का होना चाहिए ।
चाहे जितने चोले बदल जाएँ, जन्म मृत्यु के फेरे लग जाएँ ब्रह्म की अर्थात् सत्य की वे अलौकिक अनुभूतियाँ विस्मृत न हों। 
"पार होकर के परिधि से निकल"
जिंदगी का जोग भी आसन ही है।"
कबीर कहता है- "तुम हद से बेहद में चले जाओ।" सीमित से असीमित में चले जाओ, अंत से अनन्त में चले जाओ, असत्य से सत्य में चले जाओ। केवल सत्य ही नित्य है, असत्य बदलता रहता है, जन्मता है विकास पाता है मरता है। अर्थात् "असतो मा सद्गमय।"
वैरागी जी की सहज सरल पंक्तियाँ संकेत करती हैं उपनिषद् के ये कथ्य जिन्हें पढ़ कर केनोपनिषद् का सूत्र स्मरण हो आते हैं। कबीर का स्मरण हो आता है। तुलसी का स्मरण हो आता है। 

साधुवाद

रामनारायण सोनी
(18.01.2020) 

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