समुद्र का मंथन
समुद्र के किनारे रेत पर
टहलते टहलते ……
गुनगुनाये जा सकते है
गीत
उकेरे जा सकते है
प्रेम संदेश या प्रिय का नाम
पर कौन ले पाता है
थाह समुद्र की गहराई का
लहरे ……..
केवल सतह ही नही होती
वे मथती रहती है
खुद समुद्र को भी गहराई तक
दिन -ओ- रात
निकल चुका है मंथन का विष
निकल चुका है मंथन का अमृत
पर मंथन अब भी जारी है
नही चाहता समुद्र भी
अब ऐसे वरदान
फिर भी करता रहता है
मंथन स्वंय का दिन रात
समुद्र अकेले अकेले अकेले
डॉ सीमा शाहजी
❗❗❗❗❗❗
पौराणिक कथाएँ मात्र मिथक नही है वे सोद्देष्य होती हैं और उनमें स्पष्ट संकेत होते हैं जीवन दर्शन के। समुद्र मन्थन भी एक ऐसी ही गाथा है। मन्थन का अर्थ केवल बिलोना नही है वरन् एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक समांगी मिश्रण से उसमें समाहित सार तत्वों को अलग अलग करना है। जो मथा जाए उसमें गाम्भीर्य हो, गहनता हो, प्रचुरता हो, और वे तत्व योगिक न हो। ध्यान रहे पानी को या छाछ को मथने के कोई लाभ न होगा। मन्थन बिना श्रम के असंभव है।
कविता इन सभी शाश्वत नियमों कायदों का ईमानदारी से पालन करती है। समुद्र तट की रेत पर खड़े हो कर मन्थन कर पाना दिवा स्वप्न है। एक और सत्य यहाँ अनावृत होता है कि अमृत प्राप्ति के लिये किया गया मन्थन पहले जहर ले कर आवेगा। अगर रुक गए तो अपना बनाये जिन्न की तरह स्वयं अलादीन को खत्म कर देगा। लेकिन कवियित्री मिथक से और आगे चल पड़ती है। कविता समुद्र मन्थन का हाथ पकड़ कर चलना शुरू करती है और आत्म-मंथन के अपने निर्दिष्ट गन्तव्य तक पहुँच जाती है। समुद्र मंथन मात्र श्राखित रत्नों की प्राप्ति के लिये था परन्तु वहाँ १३ और रत्नों की प्राप्ति होती है। इसी तरह कविता में पुरा मन्थन अब आत्म मन्थन में बदल जाता है। जगत की यात्रा एक अन्तर्यात्रा में रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन इस यात्रा को अनन्त यात्रा होना है। कविता अपने सामान्य अर्थों में एक कुछ शब्दों और भावों की जमावट लगती है लेकिन इतनी फौरी नहीं कि पढ़ कर सरपट निकल जाएँ। इसका भी मन्थन किया जाए तो जो निर्गमित तथ्य होगा आत्म मन्थन अविरल हो और उसकी दिशा अन्तर्यात्रा ही हो, परिणाम तो स्वयं सिद्ध सत्य की प्राप्ति होगी।
स्वस्ति! साधु!!
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment