Tuesday, January 21, 2020

समीक्षा ९

समीक्षा ९

सांझ-टूटी तारिका

मेरे प्रवासी! 
कविता का मुख्य आलम्बन एक प्रवासी है। यह प्रवासी कौन है जिसे आश्वस्त किया जा रहा है? मेरे ख्याल से तो यह न शरीर न आत्मा न कोई और बल्कि यह मन है। 
ऐसा क्यों है? क्योंकि टूटता मन है, तोड़ता मन है पर जोड़ता भी मन है। मन जितना प्रवास करता है इस जगत में उतना श्रेष्ठ प्रवासी कोई नही।
"यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति। दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं, तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु।"  यजुर्वेद ३४/१
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। प्रकाशों का भी प्रकाश, वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।
"टूटी तारिका" भी एक पारम्परिक संकल्पना ही है। तारे का टूटना वैज्ञानिक सत्य नहीं है क्योंकि तारा तो एक सूर्य है। सूर्य का विखण्डन तो उसके सौरमण्डल का प्रलय है। पर कवि टूटते हुए तारे के विखण्डन को हत भाग्य और एक अभिशाप के रूप में लेता है और मन को इस विखण्डन की विभीषिका से भयमुक्त रखना चाहता है। आशय स्पष्ट है कि यह जगत गगन की तरह विशाल है और इसमें आये दिन विध्वंस चलते रहते हैं पर ए मेरे प्रवासी मन उन ऋणात्मकताओं से घबरा कर तुम किसी हताशा के शिकार न हो जाओ। इन टूटते हुए तारों का सत्य यह है कि ये उल्काएँ हैं जो तुम्हारी जगती की ओर आती हैं पर नैसर्गिक दिव्य आवरण से युक्त होने से वे समय के साथ स्वतः नष्ट हो जावेगी। अतः जो ऋणात्मकता के ध्वंस दिखाई दे रहे हैं वे आभासी हैं इसलिये तू निश्चिंत रह।
मन-चकोर एक अनाेखा रूपक है। चकोर, चाँद और रात एक युग्म है। अँधियारी रात चकोर के लिये हताशा है। चाँद का एकात्म दर्शन चकोर का चरम लक्ष्य है, आनन्द की वह पराकाष्ठा है।
उसकी दैहिक, और आत्मिक लयात्मकता केवल चाँद का दर्शन है। पर यह परिस्थिति तब निर्मित होगी जब समय रात का हो, गगन में चाँद अपनी शुभ्र किरणें लेकर विचर रहा हो। अपने पंखों से प्रवास करते हो, इस निःसर्ग का त्याग तो दमन है। प्रतीक्षा करो कि चाँद निकले। वातायन खुले रहें। प्रतीक्षा करो उस क्षण की जब तुम्हारा प्रिय तुम्हारे समक्ष होगा। 
प्रतीक्षा करो कि चाँद बादलों और परिच्छायाओं से आच्छादित नही होगा, कुहासों का विषैला दंश न होगा। रात काली न होगी। 
तुम्हारा दिव्य गुण ही है यह कि तुम संकल्पों के आवरण में रहो, विकल्पों के कुहासों से दूर रहो। 
"ज्योतिषां ज्योतिरेकं" अर्थात् तुम परम ज्योति से 'ज्योतित' हो। अपने इस दिव्य गुण का तुम्हें संज्ञान हो। वह देखो, /अन्तर-दिवा तुम्हारा/ हुई नहीं भोर इसी से/ बुझा नहीं है। अर्थात् वह आजीवन जयोतित रहता है, यह निःसर्ग ही है। 
वैसे तो सम्पूर्ण कविता मन की विभिन्न स्थितियों-परिस्थितियों का डिसेक्सन है पर कविता की अन्तिम लाइन कविता का आध्यात्मिक अमर संदेश है। विषैली नागिन इसे डंस नही सकेगी। यह मन का अमृतत्व है। 
गीता  
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।
 कविता एक रूपक के सहारे मन की उद्वेलनाओं, हताशाओं, भ्रान्तियों और निर्मल धारणाओं के उस पार स्वर्णिम भविष्य की आशा जगाती है। मन की अपरिमित शक्ति का परिचय कराती है। मन का दमन नही करती वरन् उसमें उत्साह भरती है उसे 'किंकर्तव्यविमूढ़' नही बनाती वरन् संकल्प को दृढ़ बनाती है। उसे अपने उद्देष्य पर पूर्णतया केन्द्रित होने पर जोर देती है।

रामनारायण सोनी
22.01.20

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