Friday, January 24, 2020

समीक्षा १०

एक कविता का अंश

मैं निर्मल स्रोत निर्झर हूँ भूधर से फूट आया हूँ ।
धुआँ बन कर अगन की भित्तियों से टूट आया हूँ  
बहुत उलझन बहुत पीड़ा घनेरी मोह पाशों में 
उन्ही कुछ दीर्घ धागों से वहम के छूट आया हूँ

                        डॉ जय वैरागी

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मेरी नजर में

हाथी का बच्चा जब छोटा होता है तब एक साधारण सी रस्सी उसके पैर में बाँधी जाती है और वह बँधा महसूस करने लगता है। समय बीतता जाता है और यह बन्धन उसके अवचेतन मन में पैठ जाता है। धीरे धीरे हाथी बड़ा हो जाता है तब भी वह हल्की सी जंजीर से बँधा रहता है लेकिन अपार शक्ति का स्वामी होते हुए भी वह जंजीर को तोड़ कर मुक्त होने की सोचता तक नहीं। ऐसा इसलिये होता है कि उसका अवचेतन अब भी  जंजीर को अटूट बंधन मान कर ही बैठा है। यही नियम उस आदमी पर भी लागू होता है जो अपने कुत्ते को जंजीर से बाँध कर सुबह सुबह घुमाने ले जाता है। प्रश्न उठता है कि कुत्ता आदमी से बँधा है या आदमी कुत्ते से? लेकिन देखिये यदि जंजीर आदमी के हाथ से छूट जाए और कुत्ता भागने लगे तो आदमी उसके पीछे दौड़ने लगता है। स्पष्ट है कुत्ता आदमी से नही आदमी कुत्ते से बँधा है। यह भी अवचेतन का कमाल है। 
विमोह तो हम स्वयं ओढ़ते हैं और दोष किसी अन्य को देते हैं। यह खूबसूरत वहम हमारे अवचेतन में अवस्थित हो चुका है। वस्तुतः ये वहम के दीर्घ सूत्र ही अपने अवचेतन से हटाने हैं। ये दीर्घ भी इसलिए लग रहे हैं कि हमने इन्हें दीर्घ मान लिये हैं अन्यथा तो ये सुबह पत्तों पर जमी ओस के जमाव से अधिक नहीं है। जब साँप अपनी केंचुली में रहता है तब वह समस्त को एक धुँधलके में डूबा समझता है पर उस केंचुली के हटते ही यथार्थ और सत्य प्रकट हो जाता है। मजे की बात तो यह है कि इस केंचुली को और कोई नही वह स्वयं ही हटाता है। भूगर्भ में मौजूद निर्मल शीतल जल को निर्झर बनने में सतह की कुछ पर्तें ही तो अवरोध बनी होती है। भीतर प्रचुर निर्मल जल राशि विद्यमान है तथा देश, काल और परिस्थिति के अनुकूल होते ही निर्झर फूट पड़ता है। फिर यदि निर्झर दृष्यमान है तो तय है कि वह सारे बन्धनों से मुक्त हो चुका है और अपने स्वयं के माध्यम से आत्म साक्षात्कार कर चुका है। अपने निःसर्ग को प्राप्त कर चुका है। हमें भी वहम सिर्फ इतना सा है कि हम एक रस्सी को साँप समझ बैठे हैं पर ज्ञान रूपी प्रकाश के आते ही वहम दूर हो जाता है और सत्य उजागर हो जाता है। 
भारतीय ऋष्य पंरपरा में विचारक जब आत्मचिन्तन के अतिरेक में पहुँचता है तो सूत्र लिखे जाते हैं। उपरोक्त चार पंक्तियाँ सूत्रात्मक हैं। इनका विस्तार करने पर लगता है कि वे प्रकृति और पुरुष के अक्षुण्ण विधान के ही विवेचन है। 
साधुवाद।

रामनारायण सोनी

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