Saturday, January 25, 2020

समीक्षा ९

एक कविता भारती सोनी की उनकी पुस्तक "आलापिनी"   से। श्रीमति भारती सोनी झाबुआ वनाञ्चल की प्रसिद्ध समाज सेविका, कवियित्री और शास्त्रीय संगीत की प्रशिक्षक हैं। उनके सेवा कार्य संस्कृति साहित्य और शिक्षा को जोड़ते हैं।

प्रस्तुत है कविता "बचपन"

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
  अभी चन्नी साल सतोली
  पव्वा-पाँचे गुड़िया मेरी
माँ की डाँट पिता की झिड़की
बहन हठीली भाई झक्की
  चुपके-चुपके चोरी-चोरी
  चाराने की बरफ की चुस्की
पकड़म-पाटी लंगड़ी-ताली
दिन भर खेल की खीचा तानी
  संजा की वो शाम सुहानी
  गोबर के हाथों से क्यारी
फूल पत्तियाँ कला कोट में
हाथी घोड़ा और पालकी
  भाई के संग जिद क्रिकेट की
  गुल्ली डंडा, दड़ी कबड्डी
पर पिंजरे से पिंजरा प्यारा
रूप था न्यारा परिसर न्यारा
  लुप्त हो गए वे सजीव पल
  अब तो जीवन, हाँ बस जीवन

                      भारती सोनी
🌷🌷🌷🌷🌷🌹

मेरी नजर में

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
पंक्तियाँ अतीत की उन वादियों में शब्द-मञ्च के जरिये खड़ी कर देती है जो हर सक्ष के जीवन का स्वर्णिम काल होता है। जो लौट कर तो नहीं आता है पर वे स्मृतियाँ इतनी प्रगाढ़ हो उठती हैं कि भीतर ही एक उच्छृंखल बच्चा जीवन्त हो उठता है। तो चलो चलें, जरा कवि की इस कृति के साथ थोड़ा बच्चा हो लें। जहाँ न पाने की चिन्ता है न खोने का डर है/सारा गाँव अपना घर है। शहर के खेलों में और गाँव के खेलों में थोड़ा अन्तर रहा है। यहाँ संकेत गाँव कस्बों के खेलों का है। जो भाषा और शब्द उपयोग किये गये हैं वह ग्रामीण अंचल में प्रयुक्त होते रहे हैं। इसलिये यह कविता "बचपन की मस्ती", "उस काल के "खेलों के प्रकार" और विशेष संबोधनों" की जानकारी की त्रिवेणी बहाती है। आप अच्छी तरह समझ सकते है कि साहित्य से ऐसे शब्दों का विलोप हो जाना एक युगीन-संस्कृति का विलुप्त हो जाना ही है। 
स्कूल में पढ़ा था साहित्य समाज का दर्पण है। जिस साहित्य रूपी दर्पण में समाज दिखाई दे वह कालजयी हो जाता है। साहित्य संस्कृति और संस्कार का संवाहक है। लोकसंस्कृति, लोकमंगल और लोकरंजन का संरक्षण केवल साहित्य ही से संभव है चाहे वह पुस्तकीय हो, चाहे दृष्य हो जा वह चाहे श्रव्य हो। जिन रचनाकारों ने यह काम किया है वे धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने संस्कृति को करीने से सहेजा है। भारती जी ने अपनी रचना के माध्यम से ऐसे ही कुछ दृष्यों को जीवन्त कर दिया है।
लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपती है वह अभी भी कायम हैं। उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। गाँव अब कितने बदल गए हैं। जीवन शैली ही बदल गई है लेकिन शुक्र है कि मूल संवेदना अभी भी जस की तस मौजूद है। हमारी जिम्मेदारी है इन संवेदना का अनुरक्षण करने और उन्हें तरज़ीह देने की।
स्त्रियों ने अधिकतर लोकगीतों की रचना की है, उन्हें गाया ही नहीं उनको जिया भी है। उनके पारम्परिक स्वरूप का निर्वाह भी वे बखूबी करती हैं। लोकगीतों की लय इतनी स्वाभाविक हो जाती है कि वे शास्त्रीय रूप ले लेती है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। लेकिन लोकगीतों की भाषाएं और बोलीयाँ क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। यहाँ कवियित्री ने लोकगीतों और लोकरंजन में प्रयुक्त मूल शब्दों को, जैसे सितोली, पव्वा-पाँचे, चाराने, पकड़म-पाटी, लंगड़ी-ताली, संजा, कला-कोट, दड़ी-कबड्डी आदि यथावत रख कर उन्हें जीवन्त रखा है। इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये। इस कविता में बोलचाल के प्रवाहवान शब्द हैं जैसे चाराने, दड़ी, पकड़म-पाटी आदि। ये अगली पीढ़ियों के लिये सनद होगी।
लोकगीत अध्ययन करने का विषय नहीं है इसलिये कवियित्री ने उस बचपन को जिया है
और आजादी को पिया है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। हमें लोकगीतों की प्रासंगिकता पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। 
गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक और सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें। परन्तु इस कविता में प्रयास किया गया है। इन प्रतिनिधि शब्दों में संस्कृति की छाप है। इनका उल्लेख हमारे विगत जीवन के मूल में रहे यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ईश्वर करे इनके ऊपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरों से बची रहे।

रामनारायण सोनी
26.01.2020

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