श्री धैर्यशील येवले जी पुलिस विभाग में निरीक्षक हैं। इनकी काव्य साधना उत्तम कोटि की है तथा जीवन के यथार्थ और जीवन्त-दर्शन से ओतप्रोत होती है। इनकी एक कविता .....
*मंगलमय*
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तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
आकाश ,वायु ,जल
पृथ्वी ,अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है ।
मोल तेरा कुछ भी नही
परन्तु तू है अनमोल
बिखरा दे हवा में
अपनी सुगंध
तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।
आदित्य रश्मियों का
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।
ज्ञान के भवसागर से
हो कर जाते है मार्ग
उन्नति के ,
नव वर्ष की शुभघड़ी
लिख रही तेरा ही
मंगलमय किस्सा है।
धैर्यशील येवले इंदौर
🌷💐🌸🌱🌿🌴🌳🧩🌈
*मेरी नजर में*.......
"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनन्त का हिस्सा है,
आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।7.9।।
क्योंकि इन सब में पस्मात्मा का निवास है।
"तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।"
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।
"आदित्य रश्मियों
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर"
असुर्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा आवृताः सन्ति । ये के च जनाः आत्महनः सन्ति ते प्रेत्य तान् अभिगच्छति ।।3/ईशावास्योपनिषद्।।
वे लोक सूर्य से रहित हैं और गाढ़े अन्धकार से आच्छादित हैं। उन लोकों को वे सभी लोग यहां से प्रयाण करने पर पहुंचते हैं जो कोई भी अपनी आत्मा का हनन करते हैं।
इसलिये तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।गीता 15/18।।
समस्त ज्योतियों में स्थित स्थूल ज्योति में उसी ज्योति को श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है।
तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एवयच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।माण्डूक्योपनिषद्।।
'ॐ' अक्षर अविनाशी 'ब्रह्म' का प्रतीक है। उसकी महिमा प्रकट ब्रह्माण्ड से होती है। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों वाला यह संसार 'ॐकार' ही है। यह सम्पूर्ण जगत् 'ब्रह्म-रूप' है। 'आत्मा' भी ब्रह्म का ही स्वरूप है। 'ब्रह्म' और 'आत्मा' चार चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण तथा अव्यक्त रूपों में प्रभाव डालने वाला है।
"आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।गीता।।7/4।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
धैर्यशील येवले जी ने आज जो अपनी कविता में सहज रूप में जो जो लिख डाला वह मुझे गीतात्मक और औपनिषदेय चिन्तन लगा।
समस्त व्यष्टि और समष्टि में ब्रह्म को समझना श्रेष्ठ चिन्तन है।
रामनारायण सोनी
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