Sunday, January 2, 2022

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डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की एक कविता उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक "डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की प्रतिनिधि रचनाएँ" से। 
वे एक बेहतरीन रचना शिल्पी हैं। इनकी १४ पुस्तकें काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई हैं। इनकी रचनाओं में शब्दों की कंजूसी पर भावों की प्रचुरता है। रचनाएँ सोद्देष्य और संवेदी होती हैं। इनकी रचनाधर्मिता में नये रचनाकारों को गढ़ना, उनका शोपिंग और फिनिशिंग भी शामिल है। रोटरी कान्यमञ्च के संरक्षक हैं। साहित्य से जुड़ी अनेक उपलब्धियों के धनी हैं।

"सफ़र की तैयारी"

सफ़र के पहले
बहुत कुछ तैयारी
करना होती है
उसे
जिसे करना होता है सफ़र।
एक सफर
ऐसा है, जिसकी तैयारी
करते हैं वह सब
जिन्हें यात्रा नही करनी होती।
यह यात्रा है
अन्तिम यात्रा।

डॉ सरवीन्द्र नारायण पहलवान
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

मेरी नजर में

लोग जीवन जीना सिखाते हैं पर यह कविता मरना सिखा रही है। 

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥
(ऐतरेय उपनिषद्  अध्याय 3, खण्ड 3)
अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।
यह जीना सिखाता है कि सतत कर्म रत रहो और संसार के मधुर फल प्राप्त करो। 
वहीं गीता सावधान करती है कि "जन्म मृत्यु जरा व्याधि दुःखदोषानुदर्शनम्।" आदमी को इन छ्ह बातों के बारे में पुनः पुनः विचार करना चाहिये।
एक रात नानक अचानक घर छोड़कर चले गए। खोजा गया जगह-जगह पर कहीं भी वे मिले नहीं। और तब किसी ने कहा, उन्हें मरघट की तरफ जाते देखा है। भरोसा किसी को न आया। मरघट ले जाने के लिए तो चार आदमियों की जरूरत पड़ती है, नानक ख़ुद ब ख़ुद चले गए। मरा हुआ आदमी भी वहाँ जाना नहीं चाहता। लोग मरघट पहुंचे, देखा कि वे मरघट में ध्यानस्थ बैठे थे। लोग तब चौंक गए जब नानक ने कहा, यहाँ जो आ गया वह फिर कभी नही मरता। मैने सोचा जब एक दिन यहाँ आना ही है तो चार आदमियों के कन्धे पर चढ़ कर क्या आना इसलिये मैं खुद ही चला आया हूँ। यह मेरी अपनी तैयारी है।
"जो होगा ही" उससे हमारा विरोध बना रहता है। गर्मी आएगी ही तो हमने विरोध करके पंखे, कूलर, ए. सी. लगवा लिये। बरसात आएगी तो पक्के घर बनवा लिये। सर्दी आएगी तो स्वेटर पहन लिये, हीटर लगवा लिये। हमारी अपनी चाह है कि जो नैसर्गिक रूप से हो रहा है वैसा न हो। जो होना ही है, उससे हमारा सदैव संघर्ष रहा है। जो होना ही है उसे हम आसानी से स्वीकार नहीं करते है। 
यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा सब से बड़ा आश्चर्य क्या है?
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।१६।।
यहां इस लोक से जीवधारी प्रतिदिन यमलोक को प्रस्थान करते हैं, यानी एक-एक कर सभी की मृत्यु देखी जाती है । फिर भी जो यहां बचे रह जाते हैं वे सदा के लिए यहीं टिके रहने की आशा करते हैं । इससे बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है ? 
मृत्यु होनी ही है जिसे हम स्वीकार नही करते, लेकिन क्या मृत्यु से प्रतिकार संभव है? क्या संघर्ष संभव है? मृत्यु का नाम लेते ही भय की बिजलियाँ क्यों कौंध जाती है। कोई इस पर चर्चा आरम्भ कर दे तो उसे कहते हैं - शुभ शुभ बात करो। भीतर का भय बाहर उजागर हो जाता है। मृत्यु के सत्य को स्वीकार करना उसका वरण करना कतई नहीं है वरन् वह निर्भयता की ओर श्रेष्ठ कदम है। 
"एक सफर
ऐसा है, जिसकी तैयारी
करते हैं वह सब
जिन्हें यात्रा नही करनी होती।"
कफ़न में जेब नहीं होती है पर वह कमाई जो परमार्थ के धन से जगत में छूट जाती है वह यश और श्री के रूप में स्थावर होती हैं।
कविता मृत्यु को "डर" का पर्याय नहीं उसे "महाप्रयाण" बनाती है। यह कविता भय से निर्भयता की ओर ले जाती है।

रामनारायण सोनी
19.01.20

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