Tuesday, May 30, 2017

कर्म में प्रवृत्ति


पानी का उद्गम स्थल है समुद्र, ऊष्मा का सूर्य, वायु का आकाश इसलिए जल का स्वभाव समुद्र की और बहना, जलती हुई अग्नि का ऊपर की ओर उठना। हवा को गुब्बारे अथवा कंप्रेस्सर में भर तो देते हैं पर छूटते ही वह आकाश की और भागती है। बीज बोते समय जमीन पर सीधा गिरे या उल्टा अंकुर जमीन की और भागता है और विकास पाकर तना आकाश की ओर जो उनका नैसर्गिक स्वभाव है। जंगलों में बसने वाले जानवर पकड़ कर बस्ती में लाए जावें तो बंधन खोलते ही वे पुनः जंगल की और भाग जाते हैं। पक्षी बहुत दूर तक पाँवों से चल नहीं सकता, कुछ दूर चल कर वह उड़ेगा ही। ये नैसर्गिक गुण ही उनके अपने अपने स्वभाव हैं।
धनुष की प्रत्यंचा पर तीर रख कर खींचा जाता है वह बाहरी बल के कारण खिंचा रह सकता है लेकिन अंततः धनुष अपने मूल (स्थिति) स्वभाव पर लौटता ही है। वस्तुतः जब बाहरी प्रभावों से स्वभाव के विपरीत रोकने का प्रयास होता है तो बंधन के हटते ही स्वभाव उन्हें अपनी नैसर्गिक स्थिति में धकेल देता है। यही सिद्धांत मानव की आंतरिक संवेदनाओं और मनःस्थिति पर भी लागू होता है। गुस्सा करना, अट्ठहास करना, रुदन करना आदि आदमी की सामान्य अवस्था नहीं है इसलिए कुछ समय बाद उसे सामान्य होना ही है क्योंकि मूल अवस्था की ओर लौटना उसका नैसर्गिक गुण है।
जीव जब जगत में आता है तो उसके प्रारब्ध उसके संग आते हैं। प्रारब्ध से तात्पर्य है इस जन्म के पूर्व के जन्मों तक जो-जो अच्छे-बुरे कार्य किये गए हों और उनमें से जिनका जितना भोग कर लिया गया हो तब शेष रहे फलों का वर्तमान जीवन तक पहुँच जाना ही प्रारब्ध है।
इनके मिले-जुले प्रभाव से ही चित्त की वृत्ति निश्चित होती है। इनके आनुपातिक मिश्रण से स्वभाव का निर्माण होना तय है। गुरु द्रोण के छह शिष्य एक ही राज परिवार के थे, गुरु ने उन्हें एक ही प्रकार की शिक्षा दी लेकिन अपने स्वभाव और क्षमता के अनुसार अलग अलग प्रकार से ग्रहण की गई। मधुमक्खी को गंदगी में छोड़ दो वह उड़ कर फूलों की ओर उड़ेगी ही, गधे को गंगा नहलाओ उसे धूल में लेटना ही सुहाता है।
गीता कहती है:- विभिन्न वर्णों में उत्पन्न मनुष्यों के आचरण और व्यव्हार उनके मूल स्वभाव के अनुसार ही होंगे। कर्म भी वे वैसे ही करेंगे जो उसके मूल स्वभाव के अनुरूप होंगे। जो-जो जिस-जिस वर्ण का व्यक्ति होगा उसे उस-उस प्रकार से कर्म करना ही पड़ेगा। बहुत रोकने पर भी वह अपने कर्म में प्रवृत्त होगा ही।

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