😊प्रेम का स्वीकार्य भाव😊
यदि हम समस्त के प्रति प्रेम से भर जाते हैं, तो समस्त के प्रति स्वीकार्य भाव आ जाता है। अस्वीकारत्व से प्रेम हो ही नहीं सकता। जीवन के प्रति स्वीकारोक्ति जीवन को आनन्दमय बना देती है; यहाँ तक कि मृत्यु के प्रति भी स्वीकारोक्ति मृत्यु के भय से निर्भयता प्रदान कर देती है। भय के बीचों बीच स्वीकारोक्ति खड़ी हो जाए तो जीवन में प्रेम ही प्रेम भर जावेगा। फिर डर और परेशानी का कोई स्थान नहीं रह जाता मन के भीतर। दुनिया में मृत्यु से बड़ा भय है ही नही। चवन्नी, अठन्नी सब रुपये से छोटी है। जो रुपया जेब में रखता हो वह अठन्नी चवन्नी की परवाह नहीं करता। हवा से भरे जार में जैसे जैसे जैसे पानी आता है वैसे वैसे हवा बाहर निकलती जाती है। उसी प्रकार चेतना के द्वार खुलते हैं तो प्रेम, विश्वास, आनन्द भीतर प्रवेश करते हैं अौर अप्रेम, भय अौर असुरक्षा के भाव बाहर निकलने लगते हैं। जहाँ दीप जलता है वहाँ से अंधेरा अपने आप हटता है। अंधेरा हटाना है तो अंधेरे पर ध्यान मत अटकाओ अपितु प्रकाश-दीप जलाने पर ध्यान लगाओ। अप्रेम, घृणा, ईर्षा, तितीक्षा हटाना है तो उनके हटाने पर नहीं अकेले 'प्रेम' पर ध्यान लगाओ। अप्रेम, घृणा, ईर्षा, तितीक्षा हटाने से नहीं जाएगी "प्रेम" से उनके स्थानापन्न की सोचो। अकेला प्रेम सबको हटाने में समर्थ है। चेतना के जिस द्वार से प्रेम भीतर जावेगा उसी द्वार से
अप्रेम, घृणा, ईर्षा, तितीक्षा बाहर निकल जावेगी। यह भी याद रखो कि चेतना ही के द्वार से यह सारा आदान प्रदान होगा। चेतना से ज्ञात होगा कि अप्रेम, घृणा, ईर्षा, तितीक्षा का निष्कासन हो रहा है और प्रेम आपूरित हो रहा है। अज्ञात में कुछ हुआ तो वह फिर लौट आवेगा। अस्वीकारत्व का निष्काषन ज्ञात रहेगा तो स्वीकारत्व चिर स्थाई होगा, प्रेम टिका रहेगा। डर से बड़ा डर का डर है। प्रेम में अभय है।
प्रेम की पहली सीढ़ी है हारना। स्वयं को दाँव पर लगाओ और हार जाओ, अपने अभिमान को दाँव पर लगाओ और हार जाओ। पिछली सभी जीत को दाँव पर लगाओ और उन्हें भी हार जाओ। अपनी जीत को हारते ही तुम निर्मल हो जाओगे जैसे सख्त नारियल के फूटते ही दूधिया गिरी और मीठा पानी बहने लगता है। हारे बिना प्रेम कभी नहीं पा सकोगे। जो जीत कर मिला वह प्रेम नहीं आधिपत्य था। प्रेम में जीत का स्थान ही नहीं है। इस तरह प्राप्त हुआ अप्रेम है, वहाँ भय है कि अब टूटा तब टूटा। गुणों को सभी स्वीकारते हैं पर प्रेम तो गुण-अवगुण सभी स्वीकारता है। स्वीकार्य भाव अन्तश्चेतना का प्रथम द्वार है। द्वन्द्व ले कर भीतर नहीं जा सकोगे। द्वन्द्व दो में होता है। एकल प्रवेश करना चाहते हो तो विप्लव और प्रतिरोधों को बाहर छोड़ना होगा। प्रेम से अभय हो जाओ।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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