*बुरा जो देखन मैं चला*
मेरी यह नितान्त व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है।
हमारी संस्कृति सबसे पुरातन संस्कृति है। ईश्वर ने इनमें व्यवस्था की दृष्टि से चार वर्ण बनाए हैं। "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टि"। ये वर्ण तो कर्मानुसार हैं। विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कर्म के अनुसार इनमे से किसी एक वर्ग में नहीं आता है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था का प्रादुर्भाव बाद में हुअा है। अपनी बात मैं गीता को आधार बना कर कह रहा हूँ। किसी संस्कृति की संपूर्णता के लिए इन चारों वर्णों की अत्यावश्यकता है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य के घर के सामने की सड़क को बुहारने हेतु ब्राह्मण नहीं वरन् सेवा वर्ण वाले व्यक्ति की आवश्यकता होगी। इसलिए हर वर्ण की अहमियत को नकार नहीं सकते। वे अपनी अपनी जगह श्रेष्ठ और उपयुक्त हैं।
एक जगह कथन आता है "स्वे स्वे कर्मणा अभिरत:" अर्थात् अपने निर्धारित कर्मों में उस-उस व्यक्ति को इमानदारी से लगे रहना" जरूरी है। कौन कहाँ खड़ा है? क्या कर रहा है? इसे देखने के लिए मस्तिष्क को निष्पक्ष रखना होगा। नारंगी लाल शर्मा जी को सिर्फ नारंगीलाल हो कर देखना पड़ेगा। काले चश्मे को पहन कर देखोगे तो हरा पेड़ भी काला ही लगेगा। प्रकृति को प्राकृत न देख पाने में तो दोष प्रकृति का नहीं है।
हमारे देश, हमारी सभ्यता और संस्कृति में से "मान्यता" को निकाल कर देखो। यदि बचेगा तो केवल जमीन का टुकड़ा बचेगा। कुछ चलते फिरते आदमी खुद के लिए काम करते दिखेंगे। कुछ जीव जन्तु स्वच्छन्द से दिखाई देंगे। और मान्यता के हटते ही सबसे पहले तो धर्म ही समाप्त होगा। “धर्म कोई भी हो उसके केन्द्र में श्रद्धा, विश्वास, आस्थाएँ और इन पर आधारित मान्यताएँ होती है।” इस बात को गम्भीरता से उतार कर देखना। नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति की भी उसकी अपनी मान्यता ही है- कि ईश्वर है ही नहीं। उसकी बिसात नहीं है कि ईश्वर के न होने का प्रमाण दे सके। खैर हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।
गीता यह भी कहती है कि संपूर्ण सृष्टि सत, रज और तमोगुण से पूर्ण है। पुलस्त्य ऋषि का नाती रावण अर्थात् राक्षस था। कुलों में जन्म लेने भर से गुण आधारित नहीं होते। कर्म ही निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति क्या है। मत भूलो कि अफीम के सुन्दर पौधे, सुन्दर फूल और सुन्दर फल में समाज के लिए नशा अौर विष नहीं हो सकता। वहीं यह भी सत्य है कि कड़वी अमृता में ओषधी के गुण समाहित होते हैं।
हममें से हर एक ने हर स्तर पर अपनी सुविधानुसार मान्यताएँ गढ़ ली है। कवायद करवाने वाला केप्टन स्वयं बैठे बैठे अनुशासन निर्मित नहीं कर सकता। बड़ी अजीब बात है- "एक आदमी प्रार्थना करता है कि भगवान सबका भला करे पर पहला नम्बर मेरा हो लेकिन आग लगे तो पड़ौसी का नंबर पहला हो।" कोई भी सुधार स्वयं से प्रारंभ हुआ तो समाज में कई बिम्ब प्रतिबिम्ब तैयार हो सकेंगे। किसी का दोष निकालें तो पहले दोषी स्वयँ होंगे कि हमें गुण कम दोष अधिक दिखाई देता है।
कबीर ने कहा है-
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा अपना, मुझ सा बुरा न कोय।।
यह हमारी कक्षा ३ में पढ़ाया गया था। मैंने हिन्दी के ऐसे कई पाठों का रट्टा लगाया और सौ में से सौ नम्बर लाया। परन्तु एक भी अपने भीतर नहीं उतर पाया। मैं बहिर्मुखी ही रहा अर्न्तमुखी नहीं हो पाया। मेरी तरह के लोगों से दुनिया भरी पड़ी है।
आप क्या सोचते है? इस प्रश्न से बचने की कोशिश करोगे तो मेरी लाइन में आ जाओगे। कोई भी अपना अवमूल्यन नहीं चाहता। मैं भी जानता हूँ पर अगर बताने की हिम्मत जुटा पाया तो आपके कान में ही कुछ कहूँगा।
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रामनारायण सोनी
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