Monday, September 11, 2017

जीवन सच की एक बुनाई


*जीवन सच की एक बुनाई*☝

*जीवन सच की एक बुनाई*
*आधा कुँआ आधी खाई*
*कैसी चिंता कैसी झाँई*
*मरघट ने जब देह जलाई*

इन चार लाइनों भारतीय जीवन दर्शन की एक सोच भरने का यह प्रयास है।

ईश्वर सत्य है, सत्य ही जीवन का आधार है।
हम आधे भीतर और आधे बाहर में बँटे हैं। इस बाहर-भीतर में तालमेल नहीं है। कभी कभी तो बाहर कुछ अौर भीतर कुछ होता है। अौर हाँ, इस भीतर बाहर की संधि पर कुछ इस तरह मौजूद हैं कि जैसे हम एक पहिए की सायकिल पर दम साधे बैठे गए हों। इस खेल में एक तरफ आधे में कुआँ है, दूसरी तरफ आधे में खाई है। इसलिए डरना स्वाभाविक हो जाता है।
हम बाहर से इसलिए डरते हैं कि जगत में संकट, दुख, तकलीफ और संघर्ष भरा पड़ा है। भीतर इसलिये डरते हैं कि हम हमारे ही अच्छे बुरे कर्मों को सामने नग्न खड़े देखते हैं। उनमें से जो कभी कभार अनैतिक, अनर्गल, अनुचित कर्म हो जाते हैं वे हमें सदैव डराते रहते हैं। लेकिन ये हमारे ही अर्जित कर्म फल हैं। इसलिए ऐसा लगता रहता है कि हम बाहर भी गिरते हैं और भीतर भी गिरते हैं। यह गिरावट हमारी स्वयं की होने से इसमें हमारी मदद कोई नहीं कर सकता। लेकिन ऐसा भी अक्सर होता रहता है कि हम गिरें भले ही नहीं, गिरने का भय इतना अधिक पाल लेते हैं कि वह गिर जाने से अधिक डरावना हो जाता है। बहुत ऊँचे भवन की छ्त पर खड़े हो कर देखो तो दिल बैठ-बैठ जाता है, 'लगता है कि अब गिरे तब गिरे'। वहाँ जो अहसास होता है उसे बोलचाल की भाषा में झाँई कहते हैं। इस झाँई का अर्थ यह है कि बिना गिरे ही गिरने का भयावह आभास। संघर्षों, संकटों में गिर पड़ने का अहसास हम से जीवन के आनन्द को छीन लेता है। हर दम की टूटन, बिखराव, अवसाद, चिन्ता अौर यहाँ तक कि मृत्यु के भय से जीवन की परिधि से वे आनन्द दायी क्षण लुप्त होने लगते हैं जो हमें सुख दे सकते हैं। *"भय से भरे जीवन में आनन्द का स्थान नहीं है।"* साँप सामने आकर खड़ा हो जाता है तो काट लेने का भय और काट लेने पर मृत्यु का भय। अर्थात् अन्तिम भय तो मृत्यु का भय ही है। दुनिया के जितने भय हैं वे सीमान्त में खड़े मृत्यु के भय तक जाते हैं। साँप से लड़े बगैर अन्तिम भय तक पहुँच जाना अकर्मण्यता का परिणाम है। साँप से लड़ना हमारे उपायों में शामिल है। मृत्यु के निवारण का उपाय हमारे पास नहीं है, इसलिए उस पर विचार करना व्यर्थ है, मूर्खता है, आत्मघात है। इस भय से, झाँई से बाहर निकलो। जीवन जितना सत्य है उतनी ही सत्य मृत्यु है। जीवन को जीने और मरने के दो हिस्सों में न बाँटो। वह हिस्सा जो हमारे लिए निरुपाय है उसका उपाय ढूँढने का कोई प्रयास मत करो। यह समझ लो कि वह चिरन्तन सत्य "मृत्यु" ही है। उस सत्य की स्वीकारोक्ति यह है कि "मरघट ने जब देह जलाई" अौर तब शेष और अशेष का अन्तर स्पष्ट हो जावेगा। अपने उपाय करने और उस निरुपाय होने का अन्तर भी स्पष्ट हो जावेगा।
*मृत्यु की झाँई* जीवन में से बाहर निकाल कर सत्य का दर्शन किया तो जीवन जीने के लिए आनन्द-सागर ठाठें मारता हुअा खड़ा हो जाएगा।
क्या चुनना पसन्द करोगे? भय या अभय, भ्रान्ति या प्रज्ञा, मृत्यु या अमृतत्व।
इसलिए *"कैसी चिन्ता कैसी झाँई*।

रामनारायण सोनी

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