*ऋणात्मकता में सृजन ढूँढिये*
केक्टस यदि खुद के काँटे देखता तो वह कभी का सूख जाता पर जीता इसलिए है कि मौसम आने पर उसमें एक फूल खिलेगा। इस बीच वह यदि देखे तो उसके काँटों में उसे एक खूबसूरत जमावट दिखेगी; एक लय नजर आवेगी। ये काँटे मिल कर उसमें एक सौंदर्य का दर्शन कराएँगे। इन काँटों से डर कर लोग उसका सौंदर्य नहीं बिगाड़ेंगे। ऋणात्मकता का आत्मबोध कोई न कोई प्रबल आकांक्षा का सूत्र स्वयं में पिरोए रहता है। सुकरात सोचता होगा कि अगर वह सुंदर होता तो कोई रमणी उसको दार्शनिक होने से रोक देती। बेडौल शिलाओं में से मूर्ति निकल सकती है, सुघड़ मूर्ति में से दूसरी मूर्ति तराशना मुश्किल होगा। सौंदर्य सिर्फ संगमरमर में ही नहीं काले श्याह ग्रेनाइट में भी होता है। उसमें कोई दाग भी नहीं पड़ेगा। खारे समुद्र से बादल अौर फिर बादल में से पानी धरती को नहीं मिलता तो सारे जीव केवल समुन्दर में ही रहते अौर यह धरती भी चाँद की धरती ही की तरह बाँझ होती। बिना प्रसव पीड़ा के कोई माँ नहीं होती। सोचिये; ऋणात्मकता अभिशाप नहीं कोई सृजन के बीज लिए उपस्थित है। यह वाम दर्शन का सिद्धान्त है। यह शब्द गणितीय भाषा से उपजा है। जीवन की भाषा में यह जीवन की संपूर्णता का अवश्वयंभावी अंग है।
वैज्ञानिकों ने मेंढक पर एक प्रयोग किया। उसकी एक पिछली टाँग क्षतिग्रस्त हो गई। इसकी ताकत कम हो गई। एक लकड़ी के बोर्ड पर कील लगाई गई और इस टाँग को कील से एक ढीले धागे से बाँधा गया और मेंढक का भोजन कुछ दूरी पर रखा जाता था। उसको पाने के प्रयास में मेंढक को क्षतिग्रस्त टाँग पर अधिक बल लगाना पड़ता था। उसके इस प्रयास के कारण उस टाँग की मांसपेशियाँ मजबूत होती गई और वह स्वस्थ टाँग से भी अधिक शक्तिशाली हो गई।
*ऋणात्मक को लाँघिये*
निवेदक
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment