Friday, November 3, 2017

"सर्वं खलु इदं ब्रह्म"

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*"सर्वं खलु इदं ब्रह्म*"

क्या इतना जान लेना पर्याप्त नहीं है कि जब मैं जगत में जागता रहता हूँ तो "वैश्वानर" मौजूद है। सोता हूँ तो "तैजस" उपलब्ध है। जब जागने और सोने से परे सुषुप्ति में हूँ तो बस सामने साक्ष्य है तब "प्राज्ञ" उपस्थित है ही।
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥“
विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है।
शांकरभाष्य के अनुसार "पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति" अर्थात् इन तीनो स्थानों पर "मैं वही हूँ"।
बिजली के ट्रान्सफार्मर में एक तरफ हाई वोल्टेज और दूसरी तरफ लो वोल्टेज रहता है। दोनों तरफ वही की वही विद्युत प्रवाहित होती है। वोल्टेज का नामकरण अलग अलग है पर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा वही की वही है। दोनो तरफ अपने आप में वोल्टेज शुद्ध है। हिन्दी में इसे विभव कहते हैं। दोनों तरफ अलग अलग वोल्टेज एक ही संयंत्र में कैसे रहता है यह सिद्धान्त "गेल्वेनिक आइसोलेशन" कहलाता है। यह एकत्व भी है, प्रथकत्व भी है और शुद्धत्व भी है। कारिका यही कहती है।
क्या स्वयं से साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार नही है?
तो अवस्था कोई सी भी हो; ब्रह्म का होना निश्चित है। डंके की चोंट पर कहा जा सकता है कि सर्वत्र वही है। वह बहुरूपिया नहीं है बस फंक्शनालिटी में परिर्वतन है। जैसे एक बालक का पिता घर से दुकान पर जा कर सेठ हो जाता है। शाम को थिएटर में सिनेमा देखता है तो दर्शक हो जाता है। घर लौटने पर पिता लौट आता है। पर सब जगह वह आदमी तो है ही। अंतर समझा जा रहा है केवल फंक्शनालिटी के कारण।
मछली सागर को नहीं जानती क्योंकि सदैव उसके भीतर ही रहती है। बाहर निकलेगी तो जान जाएगी कि जहाँ वह रहती है वह सागर है। अगर सागर के बगैर जी पाती तो भी उसे ध्यान नहीं हो पाता कि सागर क्या होता है? पर सागर में लौट जाए तो जानती रहेगी कि वह सागर में है।
मैं ब्रह्म में ही हूँ इसलिए जान नहीं पाया कि मैं किस में हूँ। लेकिन ब्रह्म में से बाहर मैं कभी निकल नहीं सकता अन्यथा मछली की तरह मैं भी जान पाता कि ब्रह्म क्या है। मेरी आँख मुझे नहीं दिखती। यह सेल्फी कैमरे की तरह पलट कर देख नहीं सकती। बस छूने के अहसास से, प्रज्ञा के आभास से ही पता है कि यहाँ मेरी आँख है। जैसे प्रकाश भी दिखाता ही है वह स्वयं को कैसे देखे? व्यष्टि और समष्टि से बाहर हमारी कल्पना नहीं दौड़ सकती। इसका हम भाग हैं। पर यह भी ब्रह्म में प्रस्थित है। फिर कैसे जान पाएँ कि हम किस में है, यह सब किस में है? "तद्दूरे तद्वन्तिके।"
भेद स्वयं अभेद है। जब उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो द्वैत कैसा। उसमें मैं हूँ और मुझमें वह है तो अभेद है। जो मैं हूँ वही वह है यह कथ्य भी भेदपूर्ण है। ग्लास की काँच की दीवार के बीच में पानी भरा हो तो भेद है पर काँच की दीवार अगर पानी ही की हो और उसमें पानी भरा हो तो अभेद है।
*ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।*
*ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना* *॥ ४/२४ ॥*

निवेदक
रामनारायण सोनी

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