Thursday, November 9, 2017

पाषाण बोलते भी हैं

"*पाषाणी संवेदना, कितनी दूर;कितनी पास"*
पत्थर को कभी बोलते सुनते देखा है? एक छोटे से छोटे प्रयास का मूल्यांकन करना है तो सबसे पहले उस शिल्पकार को देखना होगा जिसने बिना पत्थर में कुछ जोड़े एक आकार खड़ा कर दिया।
पत्थर कहता गया-जैसा उसने चाहा मैं अपने छैनी हथौड़े से मुझी पर प्रहार करता गया। समय के तारों भरे आकाश में एक एक कर के २७ नक्षत्र बीत गए। तब तक मैंने कुछ पाया ही नहीं था तो क्या खोता? जो अंतस में भरा पड़ा था वह किसी कोष से कम नहीं था।
अचानक मैं आकार पाने लगा। शनै शनै लगा कि थोड़ा कुछ पा कर कुछ खोने लगा हूँ। दूर से मंदिर के शिखर देख कर उसमें बैठे देव का चिर आभास धड़कनों में लय बद्ध था पर मंदिर के द्वार पर आ कर भी चिर प्यास ओठों पर चिपट सी गई। अनजाने में ही शिखर भी जाता रहा और देवता भी अलभ्य रहा। अब उसे मैं पूर्णतया खो चुका हूँ।
कठौते में झाँक रहे चाँद को छुआ ही था कि चाँद चला गया। फिर नहीं लौटा। लगा कि अब चाँद किसी और बड़े आकाश में चला गया है। कैसी विडम्बना है "मुझ पत्थर में जान आते ही शिल्पी पाषाण में रूपान्तरित हो गया।" नियति की न्याय व्यवस्था उसके बही खाते में उसकी मर्जी से लिखी गई है। फैसलों की प्रतीक्षा पहले ही दिन से क्षितिज पर जा बैठी। यही जानता था कि जहाँ आकाश और धरती मिलते हैं वहाँ एक सुहाना मंजर होगा। दौड़ कर क्षितिज पर पहुंचा तो जाना कि वह बेजान पहाड़ की तलहटी है। क्षितिज स्वयं छलावा है। जीवन के अक्षर विहीन पृष्ठों पर श्याही धब्बा बनी फैली पड़ी है।
चाँद कब सूरज से मिला है। "यह हो पाएगा" इस असत्य की छाँव में जीना क्या है?
क्या कल ठीक था? क्या आज ठीक है? प्रश्न का सीधा सीधा उत्तर है, दोनो लगभग एक से है। पर बीज का नष्ट होना और उसका अंकुरित हो कर नष्ट होना क्या जीवन पा कर खोना नहीं है? एक पीड़ा है, संत्रास है, विपर्यय है।
शायद उससे भी अधिक विदारक है। मेरी संवेदनाएँ  कभी मेरे पाषाणत्व में सोई पड़ी थी पर उसने इसे सुलगा कर एक विप्लव खड़ा कर दिया। इसे देख पाने के लिये अब वह आस पास भी नहीं है। शायद नियति ने उसे मुझसे सदा के लिए छीन लिया है। मेरा पत्थर होना तय था पर उसका, उसका पत्थर होना मुझे कष्ट देता है। मैं अब मेरी संवेदनाओं के परकोटों में एकाकी खड़ा हूँ। दिशाएँ अट्टहास करती हैं। मिट्टी का टूट जाना सरल है पर पत्थर ? कुछ ऐसे उत्तर है जो प्रश्न ही बने रहते हैं।

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