Wednesday, May 2, 2018

बौद्ध धर्म __ प्रतिमानों के संदर्भ में

*विनम्र निवेदन है कि बौद्ध धर्म  को इन प्रतिमानों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।*

सम्राट अशोक अखण्ड भारत का अन्तिम चक्रवर्ती सम्राट रहा है। कितने ग्रह कलह से जूझते हुए उसने सिंहासन पाया था, इसका गवाह इतिहास है। उसके संक्षिप्त शासन काल में देश की सीमाएँ विस्तृत हो कर संपूर्ण उप महाद्वीप में फैल गई। इसका सूत्रधार अपने आश्रम में निर्लिप्त, चाणक्य अपने वैदिक अौर सांस्कृतिक विरासत लिए बैठा था। अशोक ने  विदेशी आक्रान्ताओं से भी राष्ट्र को सुरक्षित किया था। यह उसके जीवन का पूर्वार्ध काल था। भारत के इतिहास का यह चरम बिन्दु था।
उसके जीवन काल के उत्तरार्ध में इस राष्ट्र की पतन के बीज डले जिससे हम आज तक अभिशप्त हैं। इसके कुछ मुख्य कारण थे।
पहला कारण था अशोक का बौद्ध धर्म अपनाना और उसे राजनैतिक संरक्षण प्रदान करना। बौद्धों ने अशोक के मन में युद्ध के प्रति घ्रणा भर दी और देखते ही देखते देश की रक्षा के लिए उठी तलवारों में जंग लग गई। इसके कारण सीमाएँ सिकुड़ती गई और हम क्रूर विदेशी आततायियों के आक्रमणों से टूटते पिटते रहे।
दूसरा कारण यह रहा कि भारत भर में बौद्ध भिक्षुओं की बाढ़ आगई जो स्वयं के लिए केवल तपस्या करता था और समाज उसका भरण पोषण करता था। इस तरह समाज का एक अच्छा खासा वर्ग श्रमविहीन हो गया। इसके पूर्व सनातन धर्म का ऋषि समाज में शस्त्र अौर शास्त्र की शिक्षा के गुरुकुलों से संपन्न था। ये गुरूकुल रीति-नीतियाँ और राष्ट्रधर्म प्रदान करने का दायित्व अपने ऊपर लिए हुए थे। बौद्ध धर्म के विस्तार से वे सभी विच्छिन्न हो गए। जिससे हम आज तक उबर नहीं पाए।
तीसरा कारण था अनीश्वरवाद का। यह कारण इतना संहारक सिद्ध हुआ कि इसने राष्ट्र का आधार भूत वैदिक धर्म तहस नहस कर दिया अौर वैदिक शिक्षा आदि ग्रन्थालयों में सिमट कर रह गई। तब से आज तक हम हमारे वेद से पुनः नहीं जुड़ पाए। शंकराचार्य न हुए होते तो "वेद" इतिहास का एक शब्द मात्र रह जाता।

भगवान(!) बुद्ध राजकुमार सिद्धार्थ का रूपान्तरण है। जो राजकुमार दुःख, मृत्यु, जरा, व्याधि के कारण राजपाट अौर पत्नी-बेटे को छोड़ कर वन को चला गया उसने घोर तप किया परन्तु सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् इन चारों कारणों में से किसका कितना हल दे पाए; कोई यह बताए।
जिस राष्ट्र में पहले से दिव्य धर्म-संस्कृति मौजूद थी वहाँ आंधी तूफान की तरह बौद्ध धर्म आया पर टिक नहीं सका परन्तु जो बुरी तरह डेमेज हो चुका था उस स्वर्णिम राष्ट्र को हमें कौन लौटायगा?
बौद्ध धर्म भारत छोड़ कर वहाँ चला गया जहाँ पर पहले धर्म का कोई स्पष्ट स्वरूप था ही नहीं।
हम इतने सहिष्णु हैं कि हम उनकी भी जैजैकार करते हैं जो घूँस की तरह हमारी राष्ट्र की अस्मिता के भवन को नीचे से खोखला कर रही है। बस भीड़ में से एक जय का नारा बोला और चल पड़ी जयकारे की लहर।

Disclaimer:
यह आलेख स्वयं के चिंतन पर आधारित है और किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त अभिव्यक्ति है। किसी बहस को आमंत्रण देना इसका उद्देष्य नहीं है।

रामनारायण सोनी

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