*अनन्त की ओर*
अगर तुम रोज थोड़ा थोड़ा घट रहे हो तो यह शुभ संकेत है। थोड़ा अहं घटे, थोड़ा शरीर घटे, थोड़ा लोभ मोह आदि घटे यहाँ तक कि थोड़ी तुम्हारी प्रशंसा भी घटे ताकि तुम्हारे भुट्टे जैसी अकड़न कम हो सके। प्रशंसा तुम्हे बाहर ले जाती है; भीतर देखने का अवसर ही नही देती। सहजता तुम्हें भीतर ले जाती है। सहजता का एक अर्थ है समत्व की प्रतिबद्धता।
"गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया।"
छिन छिन घटना शून्य की ओर ले जाएगा। शून्य ही पूर्ण है अर्थात् घटना तो यात्रा पूर्ण की ओर की यात्रा है।
कोई शायर कहता है..
"बर्बाद हो के यार के दिल में मिली जगह।"
तो ऐसे ही चलते रहो। अनन्त को पा नहीं सकते तो अनन्त की ओर जा तो सकते हैं।
मंजिल मिले कि ना मिले, रस्ता हसीन है
इतना सा जो समझ ले कितना ज़हीन है।
"गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया।"
छिन छिन घटना शून्य की ओर ले जाएगा। शून्य ही पूर्ण है अर्थात् घटना तो यात्रा पूर्ण की ओर की यात्रा है।
कोई शायर कहता है..
"बर्बाद हो के यार के दिल में मिली जगह।"
तो ऐसे ही चलते रहो। अनन्त को पा नहीं सकते तो अनन्त की ओर जा तो सकते हैं।
मंजिल मिले कि ना मिले, रस्ता हसीन है
इतना सा जो समझ ले कितना ज़हीन है।
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