Tuesday, January 8, 2019

सौंदर्य का अहसास

देखो!
सूर्य की पहली किरण बगीचे में सोना
बिखेर देती है इन रश्मियों का स्पर्श
पाकर कण-कण में नवीन चेतना भर
जाती हे। पुष्प खिलखिला कर हँस
पड़ते हैं। समूचे वातावरण में गजब का
आकर्षण होता है। कूजते पक्षी,  फूलों
की मादक सुगंध, उन पर मँडराती
मनोहारी अनगिनत तितलियाँ, पराग
का पान करते भँवरे और मधुपरियाँ
वहाँ एक स्वाभाविक सौंदर्य का निर्माण
करती हैं।
ऐसे में चुप क्यों हो! भीतर-बाहर बिखर
जाओ! बाहें फैलाओ, प्रकृति का आनन्द
उन्मुक्त हो तुम्हारा स्वागत कर रहा है।
कण कण में ईश्वर मुस्कुरा रहा है।
और हाँ;
प्रेम से भरी हुईं "आँखें"
श्रद्धा से झुका हुआ "सिर"
सहयोग में उठे हुऐ "हाथ"
सन्मार्ग पर चलते हुए "पाँव"
और सत्य से जुडी हुई "वाणी"
-----ईश्वर को बहुत प्रिय है।

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