एक संक्षेपिका अपनी तीनों पुस्तकों के संदर्भ में प्रस्तुत है जिन्हें वनाञ्चल ने कोट किया है....
किसको बताऊँ कि जिस पौधे को लहलहाते हुए देख रहे हैं उसके मूल में कौन है? "पिंजर प्रेम प्रकासिया" के प्रथम खण्ड के प्राणों में कौन बसा है? वह केवल प्रेम है। लौकिक, अलौकिक कभी ढाई आखर का तो कभी मौन। कभी अन्तस से बोलता है कभी मेघ गर्जन करता है। कभी आकुल करता है तो कभी रेशमी स्पर्श देता है। कभी ओँखों से बहता है कभी ऐसा जमता है कि पुतलियाँ पथरा जाती है। कौन है और कहाँ से आया है। संजय की सी दिव्य दृष्टि भी इसकी देख नहीं पाती पर एक सहज सरल हृदय के छोटे से प्याले में चाँद जैसा उतर आता है। मेरे हृदय के आवास में दो द्वार नही है उसके लिये; केवल एक है आने का। बस एक बार आया वह फिर मैं उसे नहीं वरन् वह अंक में भर लेता है मुझे। जाने का नाम नहीं लेता। क्यों? मैंने उसे नहीं उसने मुझे जकड़ लिया है। अनकन्डीशनल अटैचमेंट। इसी कारण प्रेम इस हाड़ मांस के पिंजर में फफकता उजास पैदा करता है।
"जीवन संजीवनी" को लाने वाला हनुमान कोई और है। उसमें कहीं कहीं अर्जुन और केशव उतर आते हैं और मैं मन्त्रमुग्ध हो जाता हूँ, टकटकी बँध जाती है मेरी।
जिन्दगी के कैनवास" की केवल कूँची बनी है मेरी कलम पर इसके रंग का रसायन कहीं और से आया है कैनवास बनी पृष्ठभूमि भी रसायन शास्त्री की ही है।
त्रिपथगा का सौंदर्य सबने देखा पर कहाँ है गंगोत्री, कौनसा है गौमुख। कैसे कह दूँ कि चितेरा मैं हूँ। चित्रों में दिखने वाले रंग तो मेरे हैं पर भाव कौनसे तिरोहित होते हैं। सेल्यूलॉइड पर धूप छाँव के चित्र की पृष्ठभूमि कहीं से खींच कर लाई गई है। श्वेत पर्दे पर जो दौड़ती दिखाई पड़ती है वह आभासी है।
मित्रों! जब मैं लिखता हूँ..
तो मैं नही
कोई और ही लिखता है
मुझे बस तसल्ली है..
...कि मैं लिखता हूँ।
वो ही आता है बस
कलम पर बैठ जाता है
मन की सीढ़ी पर
वो ही चढ़ जाता है।
भावों के दरिया में..
..रंग घोल घोल जाता है।
मुझे बस तसल्ली है..
...कि मैं लिखता हूँ
और सब समझते हैं कि मैं लिखता हूँ...
रामनारायण सोनी
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