कुछ विचारणीय बिन्दु
▪️कई संस्कृतियाँ आई गई। उनका उत्थान उनकी खूबियों से भले ही रहा हो पर वे क्यों एक्सटिंक्ट हो गई? इनका उत्तर सिर्फ एक हैं कि वे कहीं न कहीं जा कर अतिवादी हो गई। अपने आदर्शों को व्यापक जनाधार पर के समन्वय नहीं रख पाई।
▪️हमारी संस्कृति विश्व की सबसे पुरातन संस्कृति है।
▪️हमारे वेद सब से पुराने डाक्यूमेन्ट हैं।
▪️हम सम्पूर्ण भू लोक को कुटुम्ब मानते हैं। दूसरी सभी संस्कृतियाँ पूरी धरती को बाजार मानती है।
▪️ *हम ऋषियों की सन्ताने हैं जो वेदज्ञ गृहस्थ भी थे।*
▪️डार्विन की "थ्योरी आफ आर्गनिक इवोल्यूशन" एक हाइपोथिकेशन है जो पूर्ण अनुमानों और फॉसिल इंजीनियारिंग को मिक्स कर सिद्ध करने का ही प्रयत्न है, क्योंकि हमारी तरह उनके पास कोई डॉक्यूमेंट है ही नहीं। वे लगभग १००० साल पहले ही जंगलों के पेड़ों के मचान पर से उतरे हैं।
▪️हमने वेदो को पढ़ा ही नहीं। उनके सैकडों सूक्तों में प्रकृति, मानव, मानस और पदार्थ का विज्ञान ठसाठस भरा पड़ा है।
▪️हमारे १८ पुराण सम्पूर्ण मानव जाति का प्राकट्य, पराभव, ब्रह्म, परमात्मा और व्यवहार जगत का इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र और विकास का इतिहास है जो द्वापर युग में ऋषि वेदव्यास ने रचे हैं।
हमारे देश पर आतताई शासकों द्वारा अपनी मर्जी से इतिहास लिखे और मिटाये हैं। वस्तुतः हम अपना इतिहास जानना चाहें तो आधुनिक इतिहास को पुराणों के परिप्रेक्ष्य मै परिशुद्ध करना चाहिये।
यह क्या हो गया है हमें कि हम स्वयं को जाने बगैर किन्ही और के पीछे दौड़ पड़ते हैं।
रामनारायण सोनी
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