काँटे पैरों में लग जाए तो निकाल दोगे पर नोंके टूट कर वहीं रह जाए तो वे कीलें बन कर शरीर का हिस्सा बन जाती है। अब वे सफ़र के अलावा अब चिर संगी हो गईं। पहले किसी और साबुत काँटे से यह फाँस निकल सकती थी पर अब निकालना है तो यह कील बन गई है इस कील और काँटे आपरेशन कर के निकालना पड़ेंगे। तुम्हारे लिये सब तरफ राजपथ या पेरिस की तरह काँच की सड़क नहीं बिछी पड़ी है। जिन्दगी एक सफर है, पहली से अन्तिम साँस के बीच अनवरत चलते रहने का।
आदमी तो आखिर आदमी ही है। सफ़र जिंदगी है काँटे दुःख है, उसके आस-पास दुनिया के रिश्ते ही रिश्ते हैं। कुछ काँटे बाहरी है और फाँसें भीतर घर कर गए दुःख हैं। चलते-चलते ऊँची नीची जगहें आती है तो कष्ट उभर आते हैं। एक वक्त ऐसा भी हो सकता है कि जिंदगी में भी दुःख का अभाव भी हमारी सुख की अनुभूति लग सकता है।
जब काँटा नहीं लग रहा है तब उसकी आशंका में जीना उधार का दुःख है जबकि वह अभी दुःख आया ही नहीं है वहीं दुःख को मन तक गहरा ले जाना उसे और बढाना ही है। सुख में दुःख का भय पालना स्वयं के साथ अन्याय है और इसके लिए कोई अन्य जिम्मेदार नहीं है।
जो काँटे फाँस बन गए, अब वे कष्ट बन गए, उन्हें समय रहते बीनना जरूरी था। हमारे आस-पास के कुछ अजीब रिश्ते उन्हें कुरेद जाते है। वैसे तो वे सालती रहती हैं पर उन्हें छेड़ा गया तो वे और ज्यादा कष्ट देती हैं।
रामनारायण सोनी
२२.०२.२२
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