जड़ में चेतन का आविर्भाव
कभी कभी हम जो देखते है वह वास्तविकता में कुछ और ही होता है। इसे भ्रम भी नहीं कहा जा सकता। समुद्र के किनारे खड़े हो कर हम देखते हैं तो हमें केवल लहरें दिखाई देती है। अकेली ये लहरें समुद्र नहीं है। समुद्र के भीतर अगर गोता लगा कर देखें तो दिखाई देने वाला पानी, केवल पानी समुद्र नहीं है। आग लगने पर उठने वाला धुआँ कुछ दूर जा कर अदृष्य हो जाता है हमें लगता है वह आकाश में जा कर खो गया पर असल में वह वायुमण्डल की हवा के अणुओं के बीच छिप गया है। दुनिया में जिस जिस वस्तु के जो जो रंग दिखाई देते हैं वे उनके अपने नहीं हैं अपितु वे सूर्य के प्रकाश के वर्णक्रम के एक खास रंग को परावर्तित कर रहे हैं जैसे पत्ता हरा इसलिये दिखाई दे रहा है कि वह उस पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी में से केवल हरा रंग परावर्तित करता है। चाँदनी रात में तारे कहीं चले नहीं जाते है पर लगता है चाँदनी के उजाले ने उन्हें ढँक लिया है। मरुस्थल की तपती रेत पर से उठती गर्म हवा भी पानी की झील लगने लगती है पर वह पानी नहीं है। अर्थात् जो दिखाई पड़ रहा है उसकी वास्तविकता कुछ और ही होती है।
एक बीज जमीन में बोते हैं तो उसमें अंकुर फूटता है, वह बड़ा होते होते पौधा अथवा वृक्ष हो जाता है। हमें यह सारी प्रक्रिया भौतिक प्रकिया मालूम पड़ती है। हम इस बीज से वृक्ष बनने की प्रकिया के पूर्ण साक्षी हो सकते हैं। लेकिन जो दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह वैसा नहीं है। इसकी एक चमत्कारिक घटना को हम देख नहीं सकते। बीज एक जड़ वस्तु है, ठीक एक कंकर की तरह। विज्ञान भी इस बात को सिद्ध कर चुका है कि पौधा, वृक्ष आदि अन्य वनस्पतियाँ जीवित है। बड़ा चमत्कार है कि जड़ बीज में से जीवन कैसे प्रस्फुटित हो गया। वस्तुतः जड़ बीज में से अंकुरण की भौतिक प्रक्रिया को हम देखते हैं पर सृष्टिकर्ता की चेतना का वह अंश हमें दिखाई नहीं देता जिसने अंकुर में जीवन का संचार होता है। वास्तव में बीज बोने से वृक्ष होने और फिर उसके सर्वांगीण विकास के प्रत्येक क्षण में चेतना अनवरत काम करती है। वृक्ष को काट देने अथवा आयु पूर्ण हो कर सूख जाने पर वृक्ष फिर वह जड़ रूप में परिवर्तित हो जाता है। हम कहतें हैं वृक्ष मर गया। लेकिन इस आद्योपान्त घटना में हमें उस परमचेतन और उसकी चेतना का आभास नहीं होता।
"हम उस परम चैतन्य और उसकी चेतना का आभास करें"।
रामनारायण सोनी
२२.०३.२३
No comments:
Post a Comment