च्यवनिका
#4
च्यवनिका
#4
बूँद-बूँद बूँद
सारा समुन्दर बूँद बूँद ही तो है, और बारीकी से देखें तो बूँद ही तो है। बूँद एक शब्द का महाकाव्य है। इसमें सारे सर्ग हैं, सारे सोपान हैं, सारे रस हैं, सारे भाव-विभाव-अनुभाव है। हाँ इसमें संचारीभाव भी है। बूँद व्याकरण भी है और रचना भी। बूँद अनगिनत पात्रों का एकांकी नाटक है। बूँद भीतर से नरम और बाहर से चमकीली है।
बूँद कभी हवा में उड़ जाती है हवा जैसी हो कर, कभी जम जाती है पत्थर सी हो कर। कभी पत्तों की नोक पर ठहर कर मोती की तरह हो जाती है तो कभी दिल से नमक खींच कर लाती है और आँखों से बह कर जी हलका कर देती है। कभी बरखा बन कर धरती को तर बतर कर देती है तो कभी मेरी प्रियतमा की अलकों में ठहर कर श्रृंगार कर देती है। बूँद जो प्यास का समाधान है, बूँद जो पसीने का आधान है यही बूँद कहीं कहीं व्यवधान है। बूँद कभी घुल जाती है किसी में तो बूँद किसी को घोल लेती है खुद में। कभी पुतलियों में तैर जाती है तो कभी सूखी रेत में गिर कर खो जाती है। प्रपात में झरती है तो उसका निनाद लगता है जैसे प्रकृति गाने लगी है।
कुछ बूँदें जो द्रौपदी की आँखों से निकल कर लावा बनी तो अनगिनत लोगों को राख के ढेर में तबदील कर गई। बूँद बूँद बूँद मिल कर बाढ़ बन जाती है तब वह उच्छृंखल हो जाती है, विप्लव का पर्याय बन जाती है। जब ठहर जाती है तो सरोवर, झील, पोखर हो जाती है। बूँदें अपने प्रिय को अलविदा कहने लगती है तो लगता है वह मौन हो कर भी बिरहा गीत गा रही है। कभी इसमें विष घुल जाता है तो कभी नशा। कभी अमृत घुल जाता है तो कभी दवा। बूँद बदलियों के गर्भ में पलती है और जन्मते ही धरा की गोद में आ जाती है। अपनी ही जात के पानी में जब टप-टप टपकती है टिप-टिप का नाद उत्पन्न करती है। इसी बूँद को बरस भर के इन्तजार के बाद पपीहा पिऊ पिऊ कर आकाश में ही पी जाता है। एक लम्बी सी प्यास का छोटा सा प्यारा सा आत्मसात प्रखर प्रेम।
बूँद हमारे मुँह से प्रवेश कर खून में मिल जाती है फिर रग रग में घूमती है फिर एक दिन चिता पर लेट कर आकाश में कहीं गुम हो जाती है। कोई नहीं जानता। आते हुए देखा है उसे सब ने पर कौन देख पाया है उसे इस तरह जाते हुए।
रामनारायण सोनी
28.07.23
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