Monday, December 25, 2023

ऊर्जा का रूपान्तरण

 ••ऊर्जा का रूपान्तरण••

• दीप का जलाना चेतना का आह्वान है। अक्षुण्ण प्रकाश जिससे झरता हो क्या कोई ऐसा दीप अपने आप जला है? वह प्रतीक्षा करता है, अपने में तेल और बाती लिये बैठा होता है कि एक ज्योति स्वरूप चेतना कहीं से आवे और फिर उसे पा कर वह अपने तन से रोशनी बिखेरने लग जावेगा। 
• उजाले कहीं अन्तरिक्ष के गर्भ में छिपे होंगे तब दीपक किसी अन्तर्भूत चेतना के माध्यम से उजालों को निमन्त्रण देता है। कहता है आओ मेरे इर्द-गिर्द में जलने को तत्पर हूँ। इस आह्वान पर उजाले खिंचे चले आते हैं। यही दीपक का कर्म भी है और तप भी।
•क्या उसका अपना कोई स्वार्थनिहित है कि वह जले और उसको कोई लाभ मिले। नहीं ना? उसके परमार्थ-रथ में तप और त्याग के घोड़े जुते हैं। जो तैल उसे मिला है उस से वह उसके ऊर्जा रूपान्तरण में लग जाता है।
• दीपक की रोशनी का विस्तार उसकी आभा का विस्तार है, प्रभा का विस्तार है। यह विस्तार उसकी चाहना कतई नहीं है अपितु यह मुफ्त में मिला बायप्रोडक्ट है। जैसे फूल अपने पराग कणों में सुगन्ध लिये बैठा हो, कोई पवन की हिलोर आती है और खुशबू ले कर बाँट जाती है। दीपक जहाँ जहाँ जाता है उसका प्रभा मण्डल उसके साथ साथ चलता है। यही परमार्थ का अद्भुत संस्थान है।
• दीपक, बाती और तेल; ये सभी जड़ हैं। इसे चेतना मिलेगी तो इसमें सन्निहित ऊर्जा का रूपान्तरण हो जाएगा। 
• अपनी इस प्राप्त चेतनता से वह एक और दीप जलाने में सक्षम हो जावेगा। फिर इस दीप से फिर एक और दीप। 
इसलिए दीपक की तरह तुम अपने जड़त्व को परमात्म- चेतन से जोड़ दो और स्व के रूपान्तरण को साक्षात् अनुभव करो।

रामनारायण सोनी
26.12.23

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