Tuesday, February 20, 2024

मेरा मरा सा बचपन

मैं
मैं सच बोलने से डरता हूँ, सच ऐसा जो शायद मुझे भी पसन्द नहीं। ऐसा सच जो मैं खुद से खुद को सुनाने से डरता हूँ। लोग झूँठ बोलते हैं कि सच सिर चढ़ कर बोलता है लेकिन मैं स्वीकार करता हूँ कि सच घुट घुट कर मरता भी है और शायद थोड़ा बहुत सच तो अपने ही महाप्रयाण के साथ प्रयाण कर जाता है। ऐसा ही बड़ा सच मैंने जिया है, घूँट घूँट पिया है।
मेरे जीवन का स्वर्णिम मधुरिम कहे जाने वाले काल 'बचपन' का सुन्दर घट बहुत बहुत कठोर साँचे में ढला है, तपा है; बहुत ज्यादा ही तपा है। मैं अपने चारों तरफ देखता हूँ कि बचपन हँसता है, खिलखिलाता है, झूमता है, नाचता है, गाता है और वह सब करता है जो निर्बन्ध, निर्द्वन्द्व, निश्चल, अल्हड़ और निरापद होता है। मैं यह सब बस देखता ही देखता हूँ। देख कर लगता है कि कैसा अजीब सा बचपन था मेरा। मैं समझता हूँ कि मेरा तो बचपन आये बगैर ही चला गया। आ कर जाता तो पता भी चलता।
मैं 'माँ' लिखने में रोता हूँ, माँ कहने में रोता हूँ, माँ के बारे में पढ़ते पढ़ते रोता हूँ। माँ मेरी स्मृति में आने लायक होने से पहले ही अमूर्त हो गई। वह निष्ठुर थी? नियति निष्ठुर थी? या मेरे कोई प्रारब्ध ऐसे बँधे पड़े थे मेरी किस्मत की पोटली में। माँ मेरे लिये केवल एक शब्द ही है, ऐसा शब्द जिसका मैं अर्थ नहीं जान पाया, भाव नहीं समझ पाया, मेरे हृदय को ऐसे स्पन्दनों से कोई परिचय ही नहीं हो पाया। क्या होता है माँ का आँचल? मैं नहीं जान पाया। बस वह दुनिया में मुझे स्थापित कर के गहन आकाश में जा बसी। उसे पता नहीं कि उसकी गैर मौजूदगी मैं किस तरह रहा हूँ। मैं किसी को उसकी माँ के साथ देखता था तो ईर्ष्या की आग में झुलस जाता था और आज भी अक्सर वैसा ही कुछ होता रहता है। यह मेरे बचपन का पूर्वार्ध था। उत्तरार्ध शायद इससे भी दुरूह था, रेगिस्तान की तरह तपन और घुटन भरा था। माँ को असमय खो देना एक कष्ट ही नही हतभागी होना ही था।
फिर पिता के कठोरतम अनुशासन में वह शेष बचा बचपन कैसे बचपन रह पाता? वह ऐसा था जैसे एक तो पहले से ही दुबली गाय फिर उस पे दो आषाढ़। जैसे ठिठुरन भरी काली शात के बाद आती हुई भोर में पाला पड़ गया हो। कहते हुए भी बडी़ कोफ्त होती है कि पूज्य पिता जी ने मुझे प्रेम से कभी एक बार भी नहीं पुकारा। नहीं पूछा कि तुम कैसे हो? नहीं कहा कि आओ पास बैठो, उन्होंने मुझे कभी नहीं सुना कि मैं उनसे क्या चाहता हूँ, मेरी आँख ढूँढती रही कि कभी मेरे प्रति उनके चेहरे पर कोई स्नेह अथवा ममता का भाव दिखे। कभी नहीं देखा गया कि मैं कैसे रहता हूँ? मैं भी इतना डरा सहमा था कि कभी नहीं कह पाया कि मेरे पैर में चप्पल-जूते नहीं है, नहीं बोल पाया कि मुझे बहुत सर्दी लगती है मेरे पास न कोई स्वेटर है न ही कोट। यह भी नहीं कह पाया कि चाँदी की रकमें उजालते उजालते रीठे के पानी से मेरी हथेलियों पर सफेद पित्तियाँ उभर आयी हैं। नहीं देखा कभी उन्होंन कि मैं क्या पहनता हूँ, क्या ओढ़ता हूँ? एक बार की बात है- मैं लगभग आठ-नौ बरस का ही था। हमारे उस घोड़े को मैं कभी भूल नहीं सकता जिसे मैं जंगल में चराने ले गया था और वह वहाँ से मेरे हाथ से रस्सी छुड़ा कर भाग निकला था। घर पर पहुँचा और बताने पर मुझे खासी मार पड़ी थी। मुझे इतना याद है कि मैं पिटता रहा पर आँख से आँसू एक भी नहीं निकलने दिया बस होंठ दाँतों में दबे रहे। वह घोड़ा तो ढूँढने पर मिल गया पर मैं सामान्य अवस्था में फिर लौट ही नहीं पाया। वे क्षण आज भी मुझसे भुलाये नहीं जाते।
मुझे बड़ा अचरज होता था जब आस पड़ोस में बाप-बेटे आपस में बात करते थे। कभी कभी मुझे लगता था कि तब जीवन कुछ इस तरह चल रहा था जैसे पहाड़ी से कोई पत्थर अपने आप बेतरतीब लुढ़क रहा हो। मैं यह आज भी नहीं भूल पाता हूँ कि उस समय हम दोनों पिता पुत्र को आपस में बात करने के लिये बीच में कोई न कोई एक तीसरा आदमी बैठा होना जरूरी था नहीं तो कोई संवाद संभव नहीं था। मैं कितना डरा-सहमा हुआ रहता था बस मैं ही जानता था। ऐसा नहीं था कि पिताजी अपने जीवन में रूखे सूखे स्वभाव के ही थे। मैंने उन्हें उनके मित्रों के साथ ठहाके लगाते भी खूब देखा था। पर मेरी बारी आते ही सब कैसे बदल जाता था मैं कभी समझ नहीं पाया। मेरे अवचेतन में ज्ञात अज्ञात भय इस कदर बैठा कि वह मेरा बचपन और किशोर अवस्था कच्चा ही चबा गया। मेरे आस पास जो जो भी रहे उनकी करुणा भी मेरे प्रति कभी नहीं जागी।
इस कुण्ठा में बचपन मेरा बिना जन्मे ही मर गया। मैंने अपनी डायरी और पुस्तकों में बहुत कुछ लिखा है पर 'बचपन' मैं कभी लिख नहीं पाया न ही किलकारियाँ ही और न ही अवसाद क्योंकि अगर लिखा होता तो उसमें से लावा ही बहता। यह लावा मेरी स्वयं के मर्म को ही आघात करता।
बड़ी विडम्बना है आज मैं उस बचपन को अपने अतीत में खोजता फिरता हूँ जो मैंने कभी जिया ही नहीं या जो पाया ही नहीं। कहते हैं भविष्य के गर्भ में उम्मीद की किरणें हो सकती है पर अतीत की अँधेरी खाइयों में से कुछ भी हाथ नहीं लग सकता। 

रामनारायण सोनी
२०.०२.२४

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