"सा विद्या या विमुक्तये"
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥
कर्म वही है जो बंधन में ना बांधे, विद्या वही है जो मुक्त करे। अन्य सभी कर्म केवल निरर्थक क्रिया व अन्य सभी अध्ययन केवल शिल्प मात्र हैं।
उपनिषदों में दो उपनिषद हैं जिनका नाम प्राणियों के नाम से है। एक माण्डूक्य उपनिषद जो मण्डूक के नाम से है और दूसरा तैत्तरीय उपनिषद जो तीतर के नाम से है। निश्चित तौर से माण्डूक्य उपनिषद का विषय प्रवाह और वृत्तिबोध मेंढक के नैसर्गिक व्यवहार से समझा जा सकता है और तैत्तरीय ज्ञान को तीतर जैसे चुगने का आभास कराता है।
मण्डूक अर्थात् मेंढक के आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से नैसर्गिक गुणों पर एक नजर डाल कर देखते हैं। इनमें से कुछ बातें स्पष्ट रूप से कई समानताऍं दर्शाती है और कुछ बातें शोधार्थियों के लिये विचारणीय है।
मेंढक में कई अंतर्निहित गुण होते हैं जो उन्हें विशिष्ट बनाते हैं। उनकी त्वचा नम और पारगम्य होती है, जिससे वे पानी और ऑक्सीजन को अवशोषित कर सकते हैं, जिससे वे पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें एक अद्वितीय कंकाल संरचना होती है जिसमें छोटी रीढ़ और लम्बी टखने की हड्डियाँ शामिल होती हैं, जो उनकी शक्तिशाली कूदने की क्षमता में योगदान करती हैं। मेंढक प्रायः छलांग लगा कर ही चलते हैं। अपनी पिछली लम्बी टांगों की सहायता से मेंढक अपनी शरीर की लम्बाई से 20 गुना अधिक लम्बी छलांग लगा सकते हैं। उनका श्रोणि भी छलांग के बाद उतरने के झटके को झेलने के लिए अनुकूलित है। मेंढक प्रत्येक कूद के पहले सावधान हो कर अपने आपको तैयार करता है, उसे पता होता है कि उसे कहाँ लेंड करना है। उनकी आँखें बड़ी और उभरी हुई होती हैं, जो उन्हें सुदीर्घ दृष्टि प्रदान करती हैं, और उनके कानों में बाहर से दिखने वाले झिल्लीदार भाग (टायम्पेनम) होते हैं। मेंढक मेटामॉर्फोसिस से गुजरते हैं, जहाँ वे जल में रहने वाले टैडपोल के रूप में शुरुआत करते हैं और फिर वयस्क मेंढक के रूप में विकसित हो जाते हैं। मेंढकों में एक विशेष मूत्राशय होता है जो जल संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आसपास कमी होने पर वे अपने मूत्राशय से पानी को पुनः अवशोषित कर सकते हैं, जिससे उन्हें शुष्क वातावरण में जीवित रहने में मदद मिलती है।
सभी उभयचरों की तरह प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों, जैसे ठंडी सर्दियाँ या शुष्क मौसम में मेंढक सुप्त अवस्था में प्रवेश करते हैं। जब तापमान गिरता है, तो कुछ मेंढक जमीन के नीचे या तालाबों के तल पर कीचड़ में बिल खोद लेते हैं। वे वसंत तक इन बिलों में शीत निद्रा में रहते हैं। कुछ प्रजातियों वाले मेंढक आर्कटिक सर्कल में रह सकते हैं। वे अपने शरीर के 65 प्रतिशत हिस्से के जम जाने पर भी कई हफ़्तों तक जीवित रह सकते है। यह मेंढक अपने खून में मौजूद ग्लूकोज को एक तरह के एंटीफ्रीज के रूप में इस्तेमाल करता है जो उसके महत्वपूर्ण अंगों में जमा हो जाता है। हाइबरनेशन (ठंडी जलवायु में) या ट्रॉपिकल अर्थात् गर्म, शुष्क जलवायु में उनकी चयापचय (metobolizm) दर काफी धीमी हो जाती है, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। यहाँ तक कि पानी के नीचे कीचड़ में हाइबरनेट करने वाले उभयचर भी हाइबरनेशन के दौरान सांस लेते हैं। चूँकि उभयचर अपनी त्वचा से सांस ले सकते हैं, इसलिए वे हाइबरनेशन के दौरान पानी में से ऑक्सीजन को अवशोषित कर सकते हैं। उन्हें ऐसे पानी में हाइबरनेट करना पड़ता है जिसमें ऑक्सीजन की अच्छी मात्रा हो और कभी-कभी वे सर्दियों के दौरान उचित ऑक्सीजन के स्तर को बनाए रखने के लिए पानी में तैरते हैं। कुछ मेंढक ऐसे होते हैं जो अपने दिल और सांस को पूरी तरह से रोक सकते हैं और फिर भी जीवित रह सकते हैं। वे अपने रक्त में ग्लूकोज के उच्च स्तर को बनाए रखकर ऐसा करने में सक्षम होते हैं जो एंटीफ्रीज की तरह काम करता है और उनके महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करता है। जब मौसम गर्म होता है, तो वे जाग जाते हैं और उनका दिल और सांस सामान्य रूप से फिर से शुरू हो जाती है। एक सिद्ध योगी में इस तरह के आंशिक गुण हो सकते हैं।
मेंढक हमारी तरह पानी नहीं पीते; वे अपनी त्वचा के माध्यम से सीधे पानी को अवशोषित करते हैं, जिसे 'ड्रिंकिंग पैच' के नाम से जाना जाता है, जो उनके पेट और जांघों के नीचे स्थित होता है।
मेंढकों की आँख की तीसरी पलक होती है जो उनकी आँखों को ढकती है ताकि वे पानी के अंदर उन्हें खुला रख सकें। पलक को निक्टिटेटिंग मेम्ब्रेन कहा जाता है और यह आँखों को पानी में न होने पर भी नम रहने में मदद करती है।
यहाँ हम उपरोक्त तथ्यों में से कुछ बातों पर चर्चा करेंगे जो इस उपनिषद के लिये प्रासंगिक है।
मेंढक सामान्यतः छलांग लगा कर चलता है, वह रेंगता नहीं है। इस छलांग में सब से महत्व पूर्ण पाँव अर्थात् पाद है। उपनिषद भी चतुष्पाद की बात करता है। प्रथम पाद, जहाँ उसे समष्टि का याने स्थूल जगत का आधार है, वैश्वानर का है। यहाँ से छलांग लगी तो वह अगली अवस्था पाद जहाँ रुका वह व्यष्टि का प्रथम चरण- सूक्ष्म जगत है जो चैतन्य का दूसरा पाद तैजस के रूप में है। अगली छलाँग में वह पहुँचता है कारण जगत में जहाँ चैतन्य की उपाधि प्राज्ञ हो जाती है। हम एक अवस्था से दूसरी अवस्था में क्रॉलिंग करते हुए जाना अनुभव नहीं करते हैं। चौथी छ्लांग जैसे अनन्त अन्तरिक्ष में हो जहाँ आत्मा अपने निज स्वरूप में प्रस्थित हो जाती है। यही आत्मा ब्रह्म है, 'अयं आत्मा ब्रह्म'।
मेंढक के रूपक से देखें तो यहाँ प्रथम पाद जाग्रत से पहली छलाँग, द्वितीय पाद स्वप्न से दूसरी छलाँग, तृतीय पाद सुषुप्ति से तीसरी छ्लाँग लगती है। चतुर्थ पाद बिना प्रयास के तथा चौथी छ्लाँग का कोई लेन्डिंग नहीं है, इस कूद के पश्चात् तुरीय का अनन्त महासागर है। यही मुक्तावस्था है।
स्थूल जगत (ऐहिक) सायास है, सूक्ष्म जगत (स्वप्न) अनायास है और कारण जगत न सायास है न अनायास है, कहना चाहिये मौन जैसा है। मोटे तौर पर देखा जाय तो विश्व से तुरीय केवल तीन छ्लाँग दूर है अर्थात् यह ब्रह्म विद्या का शार्टेस्ट रूट है जो जीव को मुक्ति प्रदान करने का मार्ग है। यह बात स्पष्ट है कि माण्डूक्य को व्यव्हृत करना अत्यन्त कठिन है पर यह केवल ज्ञान तक सीमित नहीं हो सकता यह स्वानुभूति का विषय है।
रामनारायण सोनी
21.04.24
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