माना कि तुम नदी हो और नदी की तरह बहे जा रहे हो। तुम्हें शायद पता नहीं है कि नदी क्या है ? क्यों है ? क्या क्या करती है ? यदि यह पता नहीं है और फिर भी बहे जा रहे हो तो तुम्हारा बहना व्यर्थ है। तुम्हारा इस तरह बहना केवल भटकन है जो संभवतः किसी दिन किसी गंदे से पोखर में गिर जावेगा और तुम्हें पता भी नहीं चल पायेगा।
तो अभी समझो और समझो "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"
उठो अपने उद्गम से, जागो अपने कर्तव्यबोध को पहचानो, प्राप्त करो अपने नैसर्गिक व परोपकारी सद्गुणों को और जानो उस श्रेष्ठ को जो तुम्हारा गन्तव्य है।
बहो उस प्यास के लिये जो जन जन प्यास ले कर तुम्हारी ओर आते हैं, बहो उन मल्लाहों के लिये जिनके घर पर चूल्हे तुम्हारी छाती पर नाव चला कर जलते हों, बहो उन वन प्रान्तरों के लिये जिनके जो तुम्हारे किनारे नत मस्तक खड़े हैं। तुम बहो उन ऊँचे नीचे मार्गों से जहाँ से गिर कर भी तुम्हारी धारा कल कल छल छल कर संगीत की स्वर लहरियाँ पैदा कर सके। इससे पहले कि तुम अपना नाम, पता, अस्तित्व और रास्ते भर से समेटा पुण्य उस सागर को सौंप दो, कृतज्ञ हो लो कि तुम्हें यह करने की क्षमता उस विराट की अहैतुकी कृपा से प्राप्त हुई है।
रामनारायण सोनी
१३.१०.२५
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