Tuesday, August 18, 2026

लौट आओ चाँद मेरे!

लौट आओ चाँद मेरे!

सुनो तुम भी !
मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी। 
चाँद शायद यह सोचता होगा कि मैं सूरज की उधार किरणों पर क्यों जियूँ ? तो वह नक्षत्र हो गया है, सूरज हो गया।  
देखते देखते वह बहुत बड़ा हो गया। अब उसका अपना एक सौर मण्डल है। वह मग्न है अपने भव्य नव्य प्रासाद में। 

मेरा चाँद था जो मेरी रातों में दूधिया चादर बिछाता था, रात को झील में उतर आता था, दिन भर की थकान से निढाल हुई इस देह पर मरहम लगाता था। अब नक्षत्र हो चुके उस तारे की कोई किरन मेरे हृदय की खुली खिड़की से उसके होने का पता जरूर देती है पर मेरे भीतर की अमावस को भेद नहीं पाती। 
मेरी रात भी कह रही है - देख मैं काली हो कर रह गयी हूँ। क्या हमारी तमाम स्मृतियाँ किसी बीहड़ में फेंक गये हो? 
लौट आओ मेरे चाँद! मैं, मेरी धरती, मेरे लोग और खास कर के मेरा प्यासा मन तुम्हारी प्रतिक्षा में निरन्तर जाग रहा है।

रामनारायण सोनी 
१९.८.२६

No comments:

Post a Comment

लौट आओ चाँद मेरे!

लौट आओ चाँद मेरे! सुनो तुम भी ! मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी।  चाँद शायद यह सोचता होगा ...