हम साहित्य के शिल्पी हैं। शिल्पी के पास केवल छैनी-हथौड़ा होता है अौर सामने पडा होता है एक पत्थर। वह गढ़ना शुरू करता है इसके पहले ही वह अपने मन में सब कुछ गढ़ लेता है। भीतर पहले गढ़ता है बाहर तो वह डुप्लीकेशन करता है। मूल रूप से तो वह भीतर गढ़ता है। स्पष्ट है कि भीतर का सौंदर्य बाहर आता है। सृजन तो उसके मानस का उत्सर्जन है। उत्सर्जन वास्तव में तो ऊर्जा का विसर्जन है और ऊर्जा चेतना का प्रसाद है। चेतना परमात्मा की कृपा ही है। अगर उसकी कृपा की प्राप्ति आपको हो गई तो यह श्रृंखला सृजन के छोर तक विस्तारित होगी ही। हर शिल्पी का मानस उस विराट का कृपा पात्र है। शायद वह यह जानता नहीं पर ऐसा है ही। घट में पानी भरा है तो ही बाहर पानी आवेगा। रिक्त घड़े से जल पाना मरीचिका है। भीतर कुछ नहीं तो बाहर क्या लाएगा। अगर छैनी हथौड़ा चला भी दिया तो छीलन और गिट्टियों के ढेर अतिरिक्त क्या दे पाएगा।
अनवरत
इसलिये पहले भीतर का सौंदर्य प्राप्त करो।
भीतर तो सौंदर्य ही सौंदर्य है परन्तु वह बाहर के अनावश्यक कूड़े करकट से आच्छादित है। इसे हटा कर अथवा इससे हट कर उस अप्रतिम सौंदर्य की अरुणिमा की अनुभूति करो। यहाँ आनन्द का निखिल संसार आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आओ तो सही।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment