जब इन्सान धरती पर आता है तब उसके भीतर कोई रिश्ते नहीं होते हैं अलबत्ता धरती पर पहले से मौजूद लोग अपने-अपने रिश्ते उस पर लेकर खड़े हो जाते हैं। वह किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का भान्जा तो किसी का भतीजा बन जाता है; रिश्तों की एक बाढ़ सी आ जाती है।
अभी खुद उसने कोई रिश्ता नहीं बनाया है, अगर प्रथम रिश्ता वह जानता है तो केवल माँ का है। उसका संसार इसी जगह से चालू होता है। भूख लगे तो माँ, प्यास,सर्दी, गर्मी कुछ भी लगे तो बस माँ। यहाँ सब कुछ माँ से माँ तक है। वह धीरे धीरे बड़ा होने लगता है, समझ बड़ी होने लगती है। कोई उसे अच्छा लगता है, कोई अच्छा नहीं लगता है तो किसी के प्रति वह उदासीन होता है। वह अपनी कला-कौशल, अपने व्यवहार से, अपने आचरण से दोस्त-दुश्मन, प्रिय-अप्रिय बना लेता है। तब भीतर ही भीतर वह लोगों का वर्गीकरण करके एक फॉर्मेट में जमा कर रख लेता है। किसी को अपना मित्र मानता है, किसी को शत्रु या किसी व्यक्ति से उसका कोई लेना देना नहीं होता है। वह मित्र केवल उन्हें बनाता है जिनसे उसके स्वयं के विचार से मेल खाते हैं। कभी कभी मित्रता उसकी सामयिक आवश्यता होती है। वनवासी श्रीराम के लिए सुग्रीव की मित्रता उस समय की आवश्यकता थी लेकिन यह आदर्श और चिरस्थाई हो गई। सुरसा हनुमान जी की दुश्मन बन कर खड़ी हो गई परंतु उनके व्यवहार से मित्र बन गई। अर्जुन की श्रीकृष्ण से मित्रता श्रद्धा और विश्वास से परिपूर्ण आचरण से फलित हुई थी। मित्रता का निर्वहन एक कला है। श्रीकृष्ण की सुदामा से मित्रता रहना श्रीकृष्ण द्वारा मित्रता का एक आदर्श निर्वहन है। चतुराई बढ़ने लगती है; वह मुखौटे खरीदने
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