Friday, June 2, 2017

श्रद्धेय स्वामी जी

श्रद्धेय स्वामी जी

पुनः पुनः प्रणाम

योगानुशसन में रंच मात्र स्वानुभूति के आथार पर जो मुझे लगा मैंने यथानुरूप कुछ-कुछ लिखने का प्रयास किया है। जहाँ तक मैने समझा है जो मन और चित्त परमात्मा की कृपा में है उसे यह तो भरोसा है कि वह मार्ग भ्रष्ट हो ही नहीं सकता।

इस परिकल्पना में मैं १०१ प्रतिशत शास्त्रानुकूल न होऊँ पर मेरे मन्तव्य जो लगे मैं आपके श्री चरणों में समर्पित कर रहा हूँ।
मेरी किसी भी धृष्टता को अबोध अकिंचन समझ कर क्षमा करें।

विनयावनत

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