Friday, June 2, 2017

उपासना, स्वप्न और बीज एक जैसे

उपासना, स्वप्न और बीज एक जैसे है। सामान्यतया तो ऐसा लगता है कि इनमें कुछ नहीं है लेकिन इनमे सब कुछ करने की क्षमता है।

उपासना, सपने और बीज। इन तीनों में एक विचित्र सा साम्य है। प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि ये तीनों ही अपने आप में कुछ नहीं लेकिन इनके गर्भ में असीम वैभव भरा पड़ा है। उपासना से आनन्द, सपने से जीवन और बीज से आगे सृष्टि का सृजन होता है। जिस तरह वटवृक्ष के एक बीज के भीतर एक वटवृक्ष और फिर उस एक वटवृक्ष के द्वारा पुनः अनगिनत बीजों का सृजन संभव है। अगर रुकने का कोई कारण न बने तो सारी धरती वट वृक्षों से आच्छादित हो जावेगी। एक अकेले बीज की क्षमता को कम करके आँकने की भूल मत कर बैठना।
उसी तरह एक उपासना में और सपने में अनंत सृजन की सम्भावना भरी पड़ी है। उपासना के अपने ढंग हो सकते हैं, सपनों के अपने आकार हो सकते हैं और बीज की अपनी बहुगुणन क्षमता हो सकती है परंतु एक बात तो तय है कि ये तीनों ही अपने भीतर वैभव की विशाल सम्पदा संजोए है। बगैर उपासना के परम की आराधना, बगैर सपनों के सार्थक जीवन और बगैर बीज के भविष्य के गर्भ में छिपे बीजों से और असंख्य बीजों का होना अकल्पनीय है।
आवश्यकता है इस क्षमता को पहचानने की, आवश्यकता है इनके महत्व को अनावरण करने की, आवश्यकता है इसके आचरण में लाने की।

निवेदक
रामनारायण सोनी

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