Friday, June 2, 2017

संघर्ष अौर कर्म सापेक्ष नहीं है"


संघर्ष अौर कर्म सापेक्ष नहीं है"

🐝एक सकारात्मक दृष्टिकोण🐜

याद रखो नाव बहुत छोटी होती है और तूफान बहुत बड़ा। अंधेरा बहुत बड़ा होता है दीप बहुत छोटा। आसमान बहुत बड़ा होता है परिन्दे बहुत छोटे। इन बड़ों से छोटों का संघर्ष नया नहीं है। बड़ों पर छोटों की विजय गाथा चाहे कोई कहे नहीं पर यह कहानी अस्तित्व की है। तूफान कुछ देर का है इसलिए संघर्ष भी कुछ ही देर का है। तूफान में मस्तूल को समेट लो। तूफान चले जाने पर नाव फिर तैरेगी, दीप जलता रहेगा तो अंधेरा दूर खड़ा रहेगा, पूरा आसमान परिन्दे नाप नहीं सकते पर जितना नापा है उन्हीं ने नापा है। चाणक्य ने कहा था जब नदी में बाढ़ आती है तब तट पर खड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं पर बेंत का वृक्ष नहीं क्योंकि वह बाढ़ की दिशा में झुक जाता है और बाढ़ के जाते ही फिर खड़ा हो जाता है।
तुम्हारी अस्मिता अक्षुण्ण है फिर अस्तित्व से क्यों डरते हो। अस्मिता नैसर्गिक है पर अस्तित्व के लिए कर्म करना पड़ेगा। तूफान में नाव उलट पलट हो सकती है बस उसे बिखरने मत देना, दीप में तेल बना रहे यह ध्यान रखना। आकाश हमारे तुम्हारे लिए नहीं बना है वह परिन्दों की दुनिया है। आकाश अस्मिता का पोषण करेगा अस्तित्व उड़ने से कायम रहेगा। जीवन अस्मिता का दूसरा नाम है। कर्म के बिना अस्तित्व कायम रखना असंभव है। संघर्ष का मतलब लड़ाई कतई नहीं है। गीता कहती है-संघर्ष का आध्यात्मिक नाम कर्म ही है। इसलिए कर्म से अस्तित्व और अस्तित्व से अस्मिता क्रमिक अवधारणा ही है। तुम्हारी अस्मिता अक्षुण्ण है। तुम्हारा संघर्ष ही कर्म है। तुम कर्म के बिना जीवन में रह नहीं सकते। इसलिये जो "करना ही है" उसे कर्तव्य समझ कर करोगे तो जीवन बोझ नहीं होगा। जीवन में रसात्मकता तो दौड़ कर आवेगी।

रामनारायण सोनी

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