*चलो आनन्द की ओर*
दस लोग तुम्हारे साथ है और तुम एक बगीचे में घूमते हो, कैसा लगा? अब वही बगीचा है अौर फिर अकेले घूमते हो, कैसा लगा? पहले बगीचा ग्यारहवें स्थान पर था। बाद में वह दूसरे स्थान पर आ गया। बगीचे के फूलों का सौंदर्य, उनकी सुगन्ध और एक नैसर्गिक समग्रता उन दस आदमियों के पीछे छिप गई थी और उनके जाते ही प्रकट हो गई। भीड़ के साथ तुम परमात्मा से मिलने चले हो तो भीड़ ही देख पाओगे। हो सकता है तुम खुद उन दस आदमियों के लिए दर्शनीय बन जाओ। अकेले चलोगे तो ही उसका सौंदर्य पा सकोगे। यह यात्रा केवल और केवल तुम्हारी होनी चाहिए। बगीचे में उसकी समग्रता उपलब्ध है, उसमें सुगन्ध किसी ने छिड़क नहीं दी है, फूलों-पत्तियों को किसी माली ने नहीं बना दिया है, वह पूरा का पूरा नैसर्गिक है। उसका आनन्द लेना है तो बस बगीचा और तुम आमने-सामने हो जाओ। इस यात्रा में उस ओर चलोगे तो लगेगा कि बगीचा केवल तुम्हारे लिए है, तुम्हारे आनन्द के लिए है। हर फूल-पत्ती- पौधा अपना सौंदर्य और सुगन्ध लिये तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है। वह पहले भी था पर तुम स्वयं तुम्हारे साथ नहीं थे उन दसियों के साथ चल रहे थे। आँख, नाक, कान सभी उन दस आदमियों के में व्यस्त थी तो खुशबू और सुन्दरता आई और तुमसे बिना मिले गुजर गई। परमात्मा ने तुम पर अनगिनत कृपा की वृष्टि की पर तुम उससे परिचित नहीं हो पाए। और पता चला भी तो वृष्टि हुई यह पता चला कहाँ से आई पता नहीं चला। जैसे बगीचे का समग्र सौंदर्य तुम्हें माली का लगा; यह नहीं लगा कि पत्तों को किसने तराशा है, फूल में खुशबू किसने भरी है। इस सृष्टि का कारण कौन है। तुम इस सौंदर्य के आकर्षण में मत उलझ जाना; पर इसको देखे बिना भी यह नहीं जान पाओगे कि यह किसका उपकरण है। कौन है जो बिना दिखाई दिये कर रहा है। यह देखना है तो तुम्हें दसियों को छोड़ अकेला होना पड़ेगा, एकान्त को उपलब्ध होना पड़ेगा। अन्तर्मुखी होना पड़ेगा। यह बिन्दु वह स्थान है जहाँ तुम ही तुम से मिल रहे हो। बाहर तुम किन्हीं और के साथ थे यहाँ तुम अपने साथ हो। धारणा भी यहीं तक साथ चली है। यहाँ तक तुम लक्षित हो। इससे आगे अलक्षित हो। यहाँ से आगे चलोगे, चलते चलोगे तो तुम भी अशेष हो जाओगे। न लक्ष्य रहेगा न लक्ष्य का बोध। न बगीचा रहेगा न उसका सौंदर्य। यह अनुभूति शेष रहेगी कि यह समस्त उपक्रम का कारक वही है। बगीचे का सौंदर्य उस परमात्मा के अप्रतिम सौंदर्य का मात्र बाहरी परिचय है। चलो उस ओर। आनन्द परमात्मा का दूसरा नाम है।
रामनारायण सोनी
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